वे बड़े हो गए - आशापूर्णा देवी Ve Bade Ho Gaye - Hindi book by - Ashapurna Devi
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वे बड़े हो गए

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :120
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 15405
आईएसबीएन :81-7315-421-x

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प्रस्तुत है उत्कृष्ठ उपन्यास...

Ve Bade Ho Gaye - a Bangla Novel by Asha Purna Devi translated in Hindi

प्रसिद्ध बँगला साहित्य उपन्यासकार श्रीमती आशापूर्णा देवी के इस उपन्यास की मुख्य पात्र है सुलेखा, जो एक मध्य वर्गीय परिवार में पली-बढ़ी। बचपन से ही पिता को खोने से उसे तथा उसकी बीमार माँ को चाचा की गृहस्थी में शामिल होना पड़ा। बौद्धिक स्तर पर उन्नत होते हुए भी उसका मानसिक विकास न हो सका। उसके चरित्र पर गहरा प्रभाव पड़ा उसकी माँ का, जो अपनी आर्थिक दैहिक असमर्थता के कारण एक अपराध-बोध से ग्रस्त थी।

बचपन से ही सुलेखा को अपनी इच्छाओं का गला घोंटकर दूसरों को सुखी रखने की साधना में लगना पड़ा। ऐसी स्थिति निरंतर बनी रही। विवाह के पश्चात् भी कोई फेर-बदल नहीं हुआ। फलत: उसका व्यक्तित्व हीन-भाव से दब गया; परन्तु यह हीन-भाव उसकी कोमल प्रवृत्तियों को सुखा न सका। वह ममता का सागर बनकर अपने परिवार की हर खुशी के लिए अपने निजी सुख-स्वार्थ की आहुति देती रही। उसकी यह निस्वार्थ सेवा भी बहुलांश में समालोचना से घिरी रही। उसके जीवन भर की यही आकांक्षा और अभिलाषा रही कि उसके बच्चे जब बड़े हो जायँगे तब वह मुक्त होकर स्वच्छंद गति से अपना जीवन जी पाएगी।

भूमिका

इस उपन्यास की मुख्य पात्र है सुलेखा, जो एक मध्य वर्गीय परिवार में पली, बड़ी हुई। बचपन में ही पिता को खोकर उसे तथा उसकी बीमार माँ को चाचा की गृहस्थी में शामिल होना पड़ा। बौद्धिक स्तर पर उन्नत होते हुए भी उसका मानसिक विकास न हो सका। उसके चरित्र पर गहरा प्रभाव पड़ा उसकी माँ का, जो अपनी आर्थिक व दैहिक असमर्थता के कारण एक अपराध-बोध से ग्रस्त थी। बचपन से ही उसे अपनी इच्छाओं का गला घोंटकर दूसरों को सुखी रखने की साधना में लगना पड़ा। ऐसी स्थिति निरंतर बनी रही। विवाह के उपरांत भी कोई फेर-बदल नहीं हुआ। फलत: उसका व्यक्तित्व हीन-भाव से दब गया; परंतु यह हीन-भाव उसकी कोमल प्रवृत्तियों को सुखा न सका। वह ममता का सागर बनकर अपने परिवार की हर खुशी के लिए अपने निजी सुख-स्वार्थ की आहुति देती रही। उसकी यह निस्स्वार्थ सेवा भी बहुलांश में समालोचना से घिरी रही। उसके जीवन भर की यही साधना रही कि उसके बच्चे बड़े हो जाएंगे और तब वह मुक्त होकर स्वच्छंद गति से अपना जीवन जी पाएगी।

मगर इस लक्ष्य की ओर बढ़ते-बढ़ते वह इतनी यांत्रिक हो गई कि जीवन से रस ग्रहण करना भूल गई। एक दिन जब लक्ष्य सामने आ गया तब उसे एहसास हुआ कि समाप्ति तक पहुँचना ही सही ढंग से जीना नहीं है, जीवन की मिठास तो उसे हर पल जीने में है।

कथाक्रम

आगे....

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