धर्म एवं दर्शन >> प्रेममूर्ति भरत प्रेममूर्ति भरतरामकिंकर जी महाराज
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भरत जी के प्रेम का तात्विक विवेचन
श्री भरत की दुःख-भरी वाणी ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि वे राघवेन्द्र को शीघ्र-से-शीघ्र लौटाने का उपाय सोचने लगे और तब उन्होंने एक विचित्र निर्णय किया-
सकुचउँ तात कहत एक बाता।
अरध तजहिं बुध सरबस जाता।।
तुम्ह कानन गवनहु दोउ भाई।
फेरिअहिं लखन सीय रघुराई।।
समस्या का यह हल व्यावहारिक नहीं कहा जा सकता। क्योंकि इसके लिए भरत जी की स्वीकृति के साथ श्री कौशलेन्द्र की स्वीकृति भी अपेक्षित थी। श्री राम द्वारा यह प्रस्ताव स्वीकृति होने की आशा स्वप्न में भी नहीं की जा सकती। “भरत शत्रुघ्न बन जाएँ और मैं राज्य करूँ”। ऐसी बात प्रभु कैसे स्वीकार कर सकते हैं। फिर विवेकी महर्षि ने ऐसा क्यों कहा? क्या परीक्षा के लिए? मुझे यह विश्वास है कि श्री भरत स्वभाव से थोड़ा भी परिचित व्यक्ति यह नहीं सोच सकता कि वे इस प्रस्ताव से घबड़ा जाएँगें। उनका त्याग-वैराग्य इतना महान् और स्पष्ट है कि उनके सम्बन्ध में साधारण व्यक्ति भी यह धारणा नहीं बना सकता, फिर वसिष्ठ जी की तो बात ही दूसरी है। तब इस प्रस्ताव को हम एक स्वाभाविक घटना के रूप में ले सकते हैं। महर्षि इस प्रकार का उत्तर पाने को प्रस्तुत न थे। शीघ्रता में कोई सफल उपाय नहीं सूझ पा रहा है। साथ ही उन्हें राम के लौटने का पूर्ण विश्वास भी नहीं है, अतः वे जान-बूझकर ऐसा प्रस्ताव रखते हैं जो उलझनदार हो। उन्होंने सोचा होगा, ऐसा प्रस्ताव करने पर मैं इस दोष से मुक्त हो जाऊँगा कि महर्षि राम को लौटाने के पक्ष में नहीं है। साथ ही उन्हें यह भी विश्वास है कि भरत के प्रस्ताव स्वीकार कर लेने पर भी प्रभु इसे स्वीकार नहीं करेंगे। अतः इस प्रस्ताव का केवल एक ही अर्थ है कि महर्षि की ओर से अपनी सफाई।
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