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धर्म एवं दर्शन >> प्रेममूर्ति भरत

प्रेममूर्ति भरत

रामकिंकर जी महाराज

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2017
पृष्ठ :349
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9822
आईएसबीएन :9781613016169

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भरत जी के प्रेम का तात्विक विवेचन


किन्तु प्रेमपूर्ति श्री भरत और शत्रुघ्न तो इस कल्पना से ही हर्ष-विभोर हो गये कि कोई ऐसा उपाय निकल आया, जिससे राघवेन्द्र वन से लौट सकते हैं। पर उन्हें विश्वास ही नहीं होता कि हम लोगों के वन जाने मात्र-जैसी छोटी घटना के बदले में इतना महान कार्य हो सकता है। और उस समय उनकी मुखछवि दर्शनीय हो गई। वे पुलकित तन से यह प्रस्ताव करते हैं कि – “चौदह वर्ष ही नहीं, जीवन भर ही हम दोनों वन में निवास करें। इससे बढ़कर हमारे लिए सौभाग्य की कोई बात न होगी। महात्मन!  श्री सीताराम अन्तर्यामी हैं और आप भी सर्वज्ञ हैं। यदि आप सत्य कह रहे हैं, तो शीघ्रातिशीघ्र ऐसी व्यवस्था कीजिए।”

सुनि  सुबचन  हरषे दोउ  भ्राता।
भे  प्रमोद   परिपूरन    गाता।।
मन  प्रसन्न तन  तेजु  बिराजा।
जनु  जिय राउ  रामु भए राजा।।
कहहिं भरत  मुनि कहा सो कीन्हें।
फलु जग जीवन्ह अभिमत दीन्हे।।
कानन करऊँ  जनम  भरि बासू।
एहि  तें  अधिक न मोर सुपासू।।
दो. – अंतरजामी रामु सिय तुम्ह सरबग्य सुजान।
जौं फुर कहहु त नाथ निज कीजिए बचन प्रवान।।

एक सच्चे प्रेमी के हृदय का प्रतिबिम्ब ही उपर्युक्त वाक्यों के शब्द-शब्द से झलक रहा है। प्रेम के जीवन का लक्ष्य ही है प्रियतम को सुखी बनाना। वह ‘संयोग’ स्वमुख के लिए नहीं चाहता। ‘संयोग’ भी वह चाहता है केवल सेवा करके उन्हें प्रसन्न करने के लिए। यदि उसे यह ज्ञात हो जाए कि मेरे अलग रहने से उन्हें सुख होगा, तो वह सहर्ष इसके लिए प्रस्तुत हो जाता है। श्री भरत के “कानन करऊँ जनम भरि बासू” के निश्चय में इसी सिद्धान्त का स्पष्टीकरण हो जाता है। “जौं फुर कहहूँ” (यदि आप सत्य कहते हैं) इस वाक्यांश में उनकी जो सरलता झलकती है, उसकी तुलना केवल श्री राघवेन्द्र की उस सरलता से की जा सकती है, जब कैकेयी अम्बा ने महाराज दशरथ के दुःख का कारण दोनों बरदान बताया, तो उस समय प्रभु को यह विश्वास ही नहीं होता कि मेरे वन-गमन जैसी लघु घटना से पिता जी को इतना दुःख हो सकता है।

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