धर्म एवं दर्शन >> प्रेममूर्ति भरत प्रेममूर्ति भरतरामकिंकर जी महाराज
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भरत जी के प्रेम का तात्विक विवेचन
श्री भरत के भाषण का अर्थ विरोधी मतवाले को ही मध्यस्थ के पद पर प्रतिष्ठित कर देने का है। इसका प्रभाव इसे छोड़ हो ही क्या सकता था कि महर्षि भरत के सरल विश्वास के समक्ष लज्जित हो जाएँ। वे अपने पक्ष के समर्थक-रूप में स्वतन्त्र थे, पर निर्णायक-रूप में सर्वथा पराजित हो गये। श्री वसिष्ठ जी ने भरत मत का विरोध किया था और प्रेमी भरत ने इसके बदले में उनकी स्तुति और निर्णय की समस्त जिम्मेदारी अर्पित कर दी। श्री भरत के शब्दों की मधुरता देखिए –
भानुबंस भए भूप घनेरे।
अधिक एक तें एक बड़ेरे।।
जनम हेतु सब कहँ पितु माता।
करम सुभासुभ देइ बिधाता।।
दलि दुख सजइ सकल कल्याना।
अस असीस राउरि जगु जाना।।
सो गोसाईँ बिधि गति जेहि छेंकी।
सकइ को टारि टेक जो टेकी।।
दो. – बूझिय मोहि उपाउ अब सो सब मोर अभागु।
श्री भरत ने महर्षि के तर्क पर तर्क का प्रहार नहीं किया। उन्होंने तो अपनी मधुरता और प्रेम से वसिष्ठ जी के हृदय में सुप्त स्नेहसरिता को जागृत कर दिया और तब श्री भरत को कुछ न करना पड़ा। महर्षि के हृदय ने ही अपने तर्कों को स्नेहसरिता में डुबो दिया।
सुनि सनेहमय वचन गुर उर उमगा अऩुरागु।
अनुराग के पिछले समस्त तर्कों को विस्मृत कर दिया। सत्य-संधता श्रुति-सेतु-पालकता, भुलाकर राम को लौटाने का उपाय सोचने लगे। कहाँ श्री वसिष्ठ को आशा थी विवाद की। अपने तर्कों की अकाट्यता का विश्वास ही उनका बल था। शीघ्रता में कोई निर्णय करना कठिन हो गया।
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