आंख की किरकिरी - रबीन्द्रनाथ टैगोर Aankh Ki Kirkiri - Hindi book by - Rabindranath Tagore
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आंख की किरकिरी

रबीन्द्रनाथ टैगोर


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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :55
मुखपृष्ठ : ebook
पुस्तक क्रमांक : 3984
आईएसबीएन :9781613015643

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नोबेल पुरस्कार प्राप्त रचनाकार की कलम का कमाल-एक अनूठी रचना.....

8

आशा को डर लगा। क्या हुआ यह? माँ चली गईं, मौसी चली गईं। उन दोनों का सुख मानो सबको खल रहा है, अब उसकी बारी है शायद। सूने घर में दांपत्य की नई प्रेम-लीला उसे न जाने कैसी लगने लगी।

संसार के कठोर कर्तव्यों से प्रेम को फूल के समान तोड़ कर अलग कर लेने पर यह अपने ही रस से अपने को संजीवित नहीं रख पाता, धीरे-धीरे मुरझा कर विकृत हो जाता है। आशा को भी ऐसा लगने लगा कि उनके अथक मिलन में एक थकान और कमजोरी है। वह मिलन रह-रह कर मानो शिथिल हो जाता है- प्रेम की जड़ अगर कामों में न हो तो भोग का विकास पूर्ण और स्थायी नहीं होता।

महेंद्र ने भी अपने विमुख संसार के खिलाफ विद्रोह करके अपने प्रेमोत्सव के सभी दीपों को एक साथ जला कर बड़ी धूम-धाम से सूने घर के अमंगल में ही उसने आशा से कहा - 'तुम्हें इन दिनों हो क्या गया है, चुन्नी! मौसी चली गईं तो इस तरह मुँह लटकाए क्या रहती हो? हम दोनों के प्रेम में क्या सभी प्रेम समाए हुए नहीं हैं?'

आशा दुखी हो कर सोचती- 'अपने प्रेम में कोई अपूर्णता तो है। मैं तो मौसी की बात सोचा करती हूँ। सास चली गई हैं, इसका मुझे डर लगता है।'

घर के काम-काज अब ठीक से नहीं चलते। नौकर-चाकर कन्नी काटने लगे। 'तबीयत खराब है' कह कर नौकरानी एक दिन नहीं आई- रसोई पकाने वाला ब्राह्मण शराब पी कर गायब हो गया। महेंद्र ने आशा से कहा - 'खूब मजा आया, आज हम लोगों ने खुद ही रसोई बनाई।'

गाड़ी से महेंद्र न्यू मार्केट गया। कौन-सी चीज कितनी चाहिए, इसका उसे कुछ भी पता न था, बहुत-सा सामान उठा कर खुशी-खुशी घर लौटा। उन चीजों का किया क्या जाए, यह आशा भी ठीक से न जानती थी। प्रयोग में ही दिन के दो-तीन बज गए और बहुत-से अजीबो-गरीब खाना तैयार करके महेंद्र को बड़ा मजा आया। लेकिन आशा महेंद्र के उस मजे में साथ न दे सकी। अपनी अज्ञता पर उसे मन-ही-मन बड़ी लज्जा और कुढ़न हुई।

कमरे की चीजें इस कदर बिखर गई थीं किज रूरत पर कुछ पाना ही कठिन था। महेंद्र की डॉक्टरी वाली छुरी एक दिन तरकारी काटने के काम आई और कूड़ों के ढेर में जा छिपी; जिस पर वह नोट लिखा करता था, वह कापी पंखे का काम करके अंत में रसोई की राख में आराम करने लगी।

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