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कुमुदिनी (हरयाणवी लोक कथाएँ)

नवलपाल प्रभाकर

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :112
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9832
आईएसबीएन :9781613016046

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ये बाल-कथाएँ जीव-जन्तुओं और बालकों के भविष्य को नजर में रखते हुए लिखी गई है


 

सात भाई और बहन

 

किसी गांव में एक बुढ़िया रहती थी। उसके यहां सात पुत्र और एक पुत्री थी। सातों भाई धन कमाने के लिए मां से विदा लेकर एक जंगल में जाकर रहने लगे। वहां से वे सातों लकडि़यां काटकर लाते और उन्हें शहर में बेच कर आते। इस प्रकार से वे लकडि़यों का व्यापार करने लगे। फिर एक दिन राखी का त्यौहार आया।

उस लड़की ने कहा- मां मैं सात भाईयों की बहन हूँ मगर इस त्यौहार पर मेरे एक भी भाई नहीं हैं और न ही उनकी कोई खबर है। सभी बहनें अपने भाईयों को राखी बांध रहीं। मैं भी अपने भाईयों को राखी बांधूगी।

मां बोली- ठीक है बेटी और एक आटे का गोल पहिया बनाकर देती हुई बोली ये ले इसे चलाती जाना और कहना जहां पर मेरे भाई हों वहीं पर रुकना, चले-चल रे पहिये जहां मेरे भाई हों वही पर रुकना।

इस प्रकार मां से विदा लेकर वह लड़की चल पड़ी। उस पहिये को चलाती जाती और कहती चल-चल रे चून के पहिये जहां मेरे भाई हों वहां पर रुकना।

उसे चलते-चलते शाम हो गई तो वह पहिया वन के एक छोर पर बनी झोपड़ी के चारों ओर चक्कर काटने लगा मगर वह लड़की अब भी वही आवाज लगा रही थी। तभी अन्दर से एक भाई ने कहा- मुझे तो बहन की आवाज सुनाई देती है। तब दूसरा बोला- हमारी बहन यहां कैसे आयेगी। उसे तो रास्ता भी नहीं मालूम।

तब दूसरे भाई ने बाहर निकल कर देखा तो वास्तव में उनकी बहन थी। बहन को देख कर तो सभी झूम उठे। सभी ने उसे प्रेम से गले लगाया।

दूसरे दिन राखी का त्यौहार था बहन ने भाईयों को राखी बांधी और लंबी आयु की कामना की। भाईयों ने भी बहन की रक्षा करने की कसम ली। उस दिन सभी ने छुट्टी रखी और सभी ने मौज मस्ती की। परन्तु दूसरे दिन से सभी ने अपना-अपना काम शुरू कर दिया। उनकी बहन घर पर ही रहती।

एक दिन की बात है। वह कपड़े धो कर सुखा रही थी कि एक डायन की नजर उस पर पड़ी। वह डायन उसे खाने की फिराक में रहती मगर उसे पता था कि यह झोपड़ी सात भाईयों की है उन्हें पता चल गया तो वे उसे जिंदा नहीं छोड़ेंगे।

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