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तिरंगा हाउस

मधुकांत

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :182
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9728
आईएसबीएन :9781613016022

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समकालीन कहानी संग्रह

जोरदार करतल ध्वनि के बीच राधा ने अपनी बात कहनी आरम्भ की ‘प्यारे ग्रामवासियों मैं बड़ी सौभाग्यशाली हूँ पूरे गांव के लोग मुझे अपनी बेटी मानते हैं शहर में मुझे अपने माता-पिता से भी अधिक प्यार, संरक्षण और अच्छे संस्कार मिले। मुझे ‘बरगद की बेटी’ कहलवाने में तनिक भी संकोच नहीं है। ये वृक्ष तो हमारे माता पिता से भी बढ़कर है परन्तु एक पीड़ा है किसी अभागन माता ने पुत्रमोह में फंसकर या विवशतावश मुझे बरगद की शरण में छोड़ दिया। मैं आज सबल हूँ। क्या मेरी मां को इस लड़की के जिंदा होने पर गर्व नहीं होता? आप सब लोगों की सहमति के लिए में एक विचार रख रही हूँ कि मुझ जैसे बालक बालिकाओं के लिए इसी मंदिर में एक बाल्यग्राम की स्थापना की जाए। क्या आप मेरी बात से सहमत है, हाथ उठाइए... लोगों ने दोनों हाथ उठाकर अपनी सहमति प्रकट की। गाँव में बाल्यग्राम बनेगा इसकी खुशी सारे ग्रामवासियों के चेहरों पर उतर आयी।

रजनी जो पंडाल के कोने में खड़ी सब सुन रही थी, सोच में घिर गयी। ‘काश वह राधा को अपने सीने से चिपका सकती।’ उसका मन हुआ स्टेज पर चढ़कर चिल्लाए ‘राधा मेरी बेटी है, राधा को मैंने जन्म दिया है।’ यकायक वह संभल गयी कौन उसकी बात पर यकीन करेगा? और जब सबको पता लगेगा, लड़की होने के कारण मैंने उसका त्याग कर दिया था तो समाज मुझपर थूकेगा नहीं। सोचेगे आज बेटी बड़ी बन गयी तो अपनी....। मेरी मजबूरी को कौन समझेगा? उसका मन दहाड़ें मारकर रोने को हो गया। कहीं सचमुच फूट न पड़े इस डर से वह अपने मुंह पर हाथ रखकर, आंसू पोछती हुई वहां से निकल आयी।

 

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