|
ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
|
337 पाठक हैं |
|||||||
शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
“मैं नहीं देखूँगा- आँखें बन्द किये रहूँगा।”
“नहीं रह सकोगे। मैं अपने काम का भार एक दिन तुम पर ही डाल जाऊँगी। सब भूल जाओगे, पर यह कभी न भूल सकोगे।” यह कह वह कुछ देर मौन रहकर अकस्मात् अपनी पहली कहानी के सिलसिले में कहने लगी, “ऐसा अत्याचार तो होता ही है। जिस देश में लड़की की शादी न होने पर धर्म जाता है, जाति जाती है, शर्म से समाज में मुँह नहीं दिखाया जा सकता- गँवार, गूँगी, अन्धी, रोगिणी-किसी की भी रिहाई नहीं- लोग वहाँ एक को छोड़कर दूसरे की ही रक्षा करते हैं। इसके अलावा उस देश में मनुष्यों के लिए दूसरा उपाय ही क्या है, बताओ? उस दिन सब मिलकर यदि हम दोनों बहिनों को बलि न दे देते, तो दीदी शायद मरती नहीं और मैं इस जन्म में इस तरह शायद तुम्हें नहीं भी पाती, पर मेरे मन में तुम हमेशा इसी तरह प्रभु बनकर रहते। और, यही क्यों? मुझे तुम टाल नहीं पाते। जहाँ भी होते- चाहे जितने दिन हो जाते, तुम्हें खुद आकर ले ही जाना पड़ता।”
कुछ जवाब देने की सोच रहा था, हठात् नीचे से एक किशोर कण्ठ की पुकार आयी, “मौसी?”
आश्चर्य से पूछा, “यह कौन है?”
“उस मकान की मँझली बहू का लड़का है,” कहकर उसने इशारे से पास का मकान दिखा दिया और जवाब दिया, “क्षितीश, ऊपर आओ बेटा।” दूसरे ही क्षण एक सोलह-सत्रह वर्ष के सुश्री बलिष्ठ किशोर ने कमरे में प्रवेश किया। मुझे देखकर पहिले तो वह संकुचित हुआ, फिर नमस्कार करके अपनी मौसी से बोला, “आपके नाम मौसी, बारह रुपया चन्दा लिखा गया है।”
|
|||||











