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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
कहा, 'पच्चीस रुपये में दूल्हा खरीदने से यही होता है!”
राजलक्ष्मी ने कहा, “उसे तो मेरे हिस्से के पच्चीस रुपये मिल भी गये, पर तुम्हें क्या मिला था- सिर्फ एक करौंदों की माला। वह भी खरीदनी नहीं पड़ी, बन से तोड़ लाई थी।”
कहा, “जिसके दाम न लगें उसे अमूल्य कहते हैं। और कोई दूसरा आदमी तो दिखाओ जिसे मेरी तरह अमूल्य धन मिला हो?”
“बताओ कि यह क्या तुम्हारे मन की सच्ची बात है?”
“पता नहीं चला?”
“नहीं जी नहीं, नहीं चला सचमुच ही नहीं चला।” पर कहते-कहते ही वह हँस पड़ी, बोली, “पता सिर्फ तब चलता है जब तुम सोते हो- तुम्हारे चेहरे की ओर देखकर। पर इस बात को जाने दो। हम दोनों बहिनों जैसा दण्ड इस देश की सैकड़ों लड़कियों को भोगना पड़ता है। और कहीं तो शायद कुत्ते-बिल्लियों की भी इतनी दुर्गति करने में मनुष्य का हृदय-काँपता है।” यह कह क्षण-भर तक देखते रहने के बाद बोली, “शायद तुम सोचते होगे कि मेरी शिकायत में अत्युक्ति है, ऐसे दृष्टान्त भला कितने मिलते हैं? उत्तर में यदि कहती कि एक हो तो भी सारे देश के लिए कलंक है, तो मेरा जवाब काफी हो जाता, पर मैं यह न कहूँगी। मैं कहती हूँ कि बहुत होते हैं। चलोगे मेरे साथ उन विधवाओं के पास जिन्हें मैं थोड़ी-बहुत सहायता करती हूँ? वे सबकी सब गवाही देंगी कि उनके घर के लोगों के उनके भी हाथ-पैर बाँधकर ऐसे ही पानी में फेंक दिया था।”
कहा, “शायद इसी कारण उनके लिए इतनी दया-माया है?”
राजलक्ष्मी ने कहा, “तुम्हें भी होती अगर आँखें खोलकर हमारा दु:ख देखते। अब से मैं ही एक-एक कर तुमको सब दिखाऊँगी।”
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