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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
“है।”
“तो सुनो। बिना अपराध उस दण्ड के परिणाम को सुनकर तुम्हारे जैसे निष्ठुर आदमी को भी दया आ जायेगी। बुखार आता था, पर मौत नहीं आती थी। मामा खुद भी नाना तकलीफों से शय्यागत हो रहे थे। हठात् खबर मिली कि दत्त का ब्राह्मण रसोइया हमारी ही जाति का है, मामा की तरह ही असल कुलीन है। उम्र साठ के करीब है। हम दोनों बहिनों को एक साथ ही उसके हाथों सौंपा जायेगा। सबने कहा कि इस सुयोग को खो देने पर इनका कुँवारापन नहीं उतर सकेगा। उसने सौ रुपये माँगे, मामा ने थोक दर लगाई पचास रुपये। एक ही आसन पर, एक साथ और फिर मेहनत कम। यह उतरा पचहत्तर रुपये पर बोला, “महाशय, दो-दो भानजियों को कुलीन के हाथ सौंपेंगे और एक जोड़ा बकरी के दाम भी न देंगे? भोर-रात्रि में लग्न थी, दीदी तो जागी थीं किन्तु मैं पोटली जैसी उठाकर लाई गयी और उत्सर्ग कर दी गयी! सुबह से ही बाकी पच्चीस रुपयों के लिए झगड़ा शुरू हो गया। मामा ने कहा, “बाकी पच्चीस रुपये उधार रहे, अग्नि-संस्कार-क्रिया होने दो।” वह बोला, “मैं इतना बेवकूफ नहीं हूँ, इन सब मामलों में उधार-सुधार का काम नहीं।” आखिर वह लापता हो गया। शायद उसने सोचा कि मामा कहीं न कहीं से रुपये लेकर देंगे और काम पूरा करेंगे। एक दिन हुआ, दो दिन हुए, माँ ने रोना-धोना शुरू किया, मुहल्ले के लोग हँसने लगे, मामा ने दत्त के यहाँ जाकर शिकायत की, किन्तु वह फिर नहीं आया। उसके गाँव में खोज की गयी, वहाँ भी वह नहीं मिला। हमें देखकर कोई कहता कलमुँही, कोई कहता करमफूटी-शर्म के मारे दीदी घर से बाहर नहीं होती थीं। उस घर से छह महीने बाद उन्हें बाहर किया गया श्मशान के लिए! और कोई छह महीने बाद कलकत्ते के किसी होटल से समाचार आया कि वहाँ खाना पकाते वर महोदय भी बुखार से मर गये। इस तरह ब्याह पूरा नहीं हुआ।”
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