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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
उसके मुँह की ओर देखकर श्रद्धा और स्नेह से हृदय परिपूर्ण हो गया। मन-ही-मन सोचा, हृदय का विनिमय नर-नारी की अत्यन्त साधारण घटना है-संसार में नित्य ही घटती रहती है- विराम नहीं, विशेषत्व नहीं। फिर भी यह दान और प्रतिग्रह की व्यक्ति-विशेष के जीवन का अवलम्बन कर ऐसे विचित्र विस्मय और सौन्दर्य से उद्भासित हो उठता है कि उसकी महिमा युग-युगान्त तक मनुष्य के हृदय को अभिषिक्त करती रहकर भी समाप्त नहीं होना चाहती। यही वह अक्षय सम्पत्ति है जो मनुष्य को बृहत् करती है, शक्तिशाली बनाती है और अकल्पित कल्याण द्वारा नया बना देती है। पूछा, “तुम बंकू का क्या करोगी?”
राजलक्ष्मी ने कहा, “वह अब मुझे नहीं चाहता। सोचता है कि यह आफत दूर हो जाय तो अच्छा है।”
“किन्तु वह तो तुम्हारा नजदीक का अपना है, उस तुमने बचपन से ही पाल-पोसकर आदमी जो बनाया है?”
“यह आदमी बनाने का सम्बन्ध ही रहेगा, और कुछ नहीं। वह मेरा नजदीक का अपना नहीं है।”
“क्यों नहीं है? अस्वीकार कैसे करोगी?”
'अस्वीकार करने की इच्छा मेरी भी न थी,” फिर क्षण-भर तक चुप रहने के बाद बोली, “मेरी सब बातें तुम भी नहीं जानते। मेरे विवाह की कहानी सुनी थी?”
“लोगों की जुबानी सुनी थी। पर उस वक्त मैं देश में न था।”
“हाँ, नहीं थे। दु:ख का ऐसा इतिहास और नहीं है, ऐसी निष्ठुरता भी शायद कहीं नहीं हुई। पिता माँ को कभी नहीं ले गये, मैंने भी उन्हें कभी नहीं देखा। हम दोनों बहिनें मामा के यहाँ ही बड़ी हुई, बचपन में ज्वर की वजह से हमारा चेहरा कैसा हो गया था, याद है?”
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