|
ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
|
337 पाठक हैं |
|||||||
शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
“पर इस भंगुर शरीर के लिए अगर तुम क्षण-क्षण इतनी उद्विग्न होती रहोगी तो मन को शान्ति नहीं मिलेगी, लक्ष्मी।”
राजलक्ष्मी ने कहा, “यह उपदेश बहुत काम का है, पर यह मुझे न देकर यदि खुद ही जरा सावधान रहो, तो शायद थोड़ी-सी शान्ति पा सकूँ।” सुनकर चुप रहा। क्योंकि, इस बारे में तर्क करना सिर्फ निष्फल ही नहीं, अप्रीतिकर भी होता है। स्वयं उसका अपना स्वास्थ्य अटूट है, पर जिसको यह सौभाग्य प्राप्त नहीं है बिना कारण भी वह बीमार हो सकता है, यह बात वह किसी तरह भी नहीं समझेगी। कहा, “शहर में मैं कभी नहीं रहना चाहता। उस समय गंगामाटी मुझे अच्छी ही लगी थी। यह बात तुम आज भूल गयी हो लक्ष्मी कि, मैं वहाँ से अपनी इच्छा से चला भी नहीं आया था।”
“नहीं जी नहीं, भूली नहीं हूँ, सारी जिन्दगी नहीं भूलूँगी” यह कहकर वह जरा हँसी। बोली, “उस बार तुम्हें ऐसा लगता था मानो किसी अनजान जगह में आ गये हो, पर इस बार जाकर देखोगे कि उसकी आकृति-प्रकृति ऐसी बदल गयी है कि उसे अपना समझने में तुम्हें जरा भी अड़चन न होगी। और सिर्फ घर-बार और रहने की जगह ही नहीं, इस बार जाकर मैं बदलूँगी, स्वयं अपने को और सबसे ज्यादा तोड़-मोड़कर नये सिरे से गढ़ूँगी तुम्हें- अपने नये गुसाईंजी को, जिससे कमललता दीदी फिर पथ-विपथ में घूमने का साथी बनाने का दावा पेश न कर सकें।”
“शायद यही सब सोच-समझकर स्थिर किया है?”
राजलक्ष्मी ने हँसते हुए कहा, “हाँ! तुम्हें क्या बिना मूल्य यों ही ले लूँगी- उसका ऋण नहीं चुकाऊँगी? और जाने के पहले, मैं भी तुम्हार जीवन में सचमुच ही आई थी, इस आने के चिह्न को न छोड़ जाऊँगी? ऐसी ही निष्फल चली जाऊँगी? नहीं, यह किसी तरह न होने दूँगी।”
|
|||||











