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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
राजलक्ष्मी क्षण-भर में ही करुणा और कृतज्ञता से बिगलित होकर बोली, “तो तुम रहो, आनन्द देवर को लेकर मैं बर्मा जाती हूँ, पकड़कर उन लोगों को ले आऊँगी। यहाँ उनके लिए कोई प्रबन्ध हो ही जायेगा।”
“यह हो सकता है, किन्तु वे बहुत अभिमानिनी है। मैं न गया तो शायद वह न आयेगी।”
राजलक्ष्मी ने कहा, “आयेगी। यह समझेगी कि तुम्हीं उन लोगों को लेने आये हो। देखना, मेरा कहना गलत नहीं होगा।”
“पर मुझे छोड़कर जा तो सकोगी?”
राजलक्ष्मी पहले तो चुप रही, फिर अनिश्चित कण्ठ से धीरे से बोली, “इसी का तो मुझे डर है। शायद नहीं जा सकूँगी। पर इससे पहले चलो न थोड़े दिनों तक गंगामाटी में चलकर रहें।”
“वहाँ क्या तुम्हें कोई विशेष काम है?”
“थोड़ा-सा है। कुशारीजी को खबर मिली है कि पास का पोड़ामाटी गाँव बिकने वाला है। सोचती हूँ कि वह खरीद लूँ। और उस मकान को भी अच्छी तरह से तैयार कराऊँ जिससे तुम्हें रहने में कष्ट न हो। उस दफा देखा कमरे के अभाव में तुम्हें बड़ा कष्ट होता था।”
“कमरे के अभाव की वजह से कष्ट नहीं होता था, कष्ट तो दूसरे कारण से होता था!”
राजलक्ष्मी ने जान-बूझकर ही इस बात पर कोई ध्यान नहीं दिया। कहा, “मैंने देखा है कि वहाँ तुम्हारा स्वास्थ्य अच्छा रहता है। तुम्हें शहर में ज्यादा दिनों तक रखने का साहस नहीं होता, इसीलिए तो जल्दी से हटा ले जाना चाहती हूँ।”
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