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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
ये बातें सुनकर विस्मित हुआ। पूछा, “यह सब तुमने सीखा किससे?”
राजलक्ष्मी ने कहा, “क्या मालूम किससे, शायद तुमसे ही। तुम कुछ करते नहीं, कुछ माँगते नहीं, किसी पर जोर नहीं डालते। इसीलिए तुमसे सीखना सिर्फ सीखना नहीं है, वह तो सत्यरूप में पाना है। हठात् एक दिन आश्चर्य के साथ सोचना पड़ता है कि यह सब कहाँ से आया? पर इसे जाने दो, इस बार जाकर बड़ी कुशारी-गृहिणी से मित्रता करूँगी और उस दफा उनकी अवहेलना करके जो गलती की है, अबकी बार उसे सुधारूँगी। चलोगे न गंगामाटी?”
“किन्तु बर्मा? मेरी नौकरी?”
“फिर वही नौकरी? अभी तो कहा कि मैं तुम्हें नौकरी नहीं करने दूँगी।”
“लक्ष्मी, तुम्हारा स्वभाव खूब है। तुम कहती कुछ नहीं, चाहती कुछ नहीं, किसी पर जोर भी नहीं करतीं-विशुद्ध वैष्णव- सहनशीलता का नमूना सिर्फ तुम्हारे ही निकट मिलता है।”
“इसीलिए क्या जिसकी जो इच्छा होगी, उसी का अनुमोदन करना पड़ेगा? संसार में क्या और किसी का दु:ख-सुख नहीं है? तुम्हीं सब कुछ हो?”
“ठीक कहती हो, किन्तु अभया? उसने प्लेग का भय नहीं किया। अगर उस दुर्दिन में आश्रय देकर वह न बचाती तो शायद आज तुम मुझे पातीं ही नहीं। आज उसका क्या हुआ, यह क्या बिल्कुल ही न सोचूँ?”
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