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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
“अच्छी बात है, करो।”
राजलक्ष्मी अपने मन में न जाने क्या सोचने लगी, फिर सहसा कह उठी- “देखो, इस सुनन्दा के जैसे अच्छी, निर्लोभ और सत्यवादी और कोई दूसरी औरत मैंने नहीं देखी, पर जब तक उसकी विद्या की गरमी न जायेगी तब तक वह विद्या किसी काम नहीं लगेगी।”
“पर सुनन्दा को विद्या का घमण्ड तो नहीं है?”
राजलक्ष्मी ने कहा, “नहीं, दूसरों की तरह नहीं है-और यह बात मैंने कही भी नहीं। वह कितने श्लोक, कितनी शास्त्र-कथाएँ, कितने उपाख्यान जानती है। उसके मुँह से सुन-सुनकर ही तो मेरी यह धारणा हुई थी कि मैं तुम्हारी कोई नहीं हूँ, हमारा सम्बन्ध झूठा है- और विश्वास भी तो यही करना चाहा था- पर भगवान ने मेरी गर्दन पकड़कर समझा दिया कि इससे बढ़कर मिथ्या और कुछ नहीं है। इसी से समझ लो कि उसकी विद्या में कहीं जबरदस्त भूल है। इसीलिए देखती हूँ कि वह किसी को सुखी नहीं कर सकती, सिर्फ दु:ख ही दे सकती है। उसकी जेठानी उससे बहुत बड़ी है। सीधी-सादी है, पढ़ना-लिखना नहीं जानती, पर दिल में दया-माया भरी हुई है। कितने दु:खी और दरिद्र परिवारों का वह लुक-छिपकर प्रतिपालन करती है- किसी को पता भी नहीं चलता। जुलाहे-परिवार के साथ जो एक सुव्यवस्था हो गयी, वह क्या कभी सुनन्दा के जरिए हो सकती थी? तुम क्या यह सोचते हो कि वह तेज दिखलाकर मकान छोड़कर चले जाने के कारण हुई है? कभी नहीं। यह तो उसकी बड़ी देवरानी ने अपने पति के पैरों पड़ और रो-धोकर किया है। सुनन्दा ने सारी दुनिया के सामने अपने बड़े जेठ को चोर कहकर छोटा कर दिया- यही क्या शास्त्र-शिक्षा का सुफल है? उसकी पोथी की विद्या जब तक मनुष्यों के सुख-दु:ख, भलाई-बुराई, पाप-पुण्य, लोभ-मोह के साथ सामंजस्य नहीं कर पाती तब तक पुस्तकों के पढ़े हुए कर्तव्य-ज्ञान का फल मनुष्य को बिना कारण छेदेगा, अत्याचार करेगा और तुम्हें बताये देती हूँ, कि संसार में किसी का भी कल्याण नहीं करेगा।”
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