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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
कहा, “समझ लो कि वहाँ चली ही गयीं; किन्तु उनके निकट जाते हुए इस बार तुम्हें शर्म नहीं आयेगी?”
राजलक्ष्मी ने कुण्ठित हास्य से सिर हिलाकर कहा, “पर उनमें से तो कोई भी यह नहीं जानता कि काशी में बाल वगैरह कटाकर मैंने स्वाँग बनाया था। बाल अब बहुत कुछ बढ़ गये हैं, पता नहीं पड़ सकता कि कभी कटे थे, और फिर मेरे सारे अन्याय और सारी लज्जा दूर करने के लिए तुम भी तो मेरे साथ हो!”
कुछ ठहरकर बोली, “खबर मिली है कि वह हतभागिनी मालती फिर लौट आई है और साथ लाई है अपने पति को। उसके लिए एक हार गढ़वा दूँगी।”
कहा, “ठीक है, गढ़ा देना किन्तु वहाँ जाकर फिर अगर सुनन्दा के पल्ले पड़ जाओ...”
राजलक्ष्मी जल्दी से बोल उठी, “नहीं जी नहीं, अब वह डर नहीं है, उसका मोह अब दूर हो गया है। बाप रे बाप, ऐसी धर्म-बुद्धि दी कि रात-दिन न तो आँखों के आँसू ही रोक सकी, न खाना ही खा सकी और न सो सकी। यही बहुत है कि पागल नहीं हुई।” फिर उसने हँसकर कहा, “तुम्हारी लक्ष्मी चाहे जैसी हो, लेकिन अस्थिर मन की नहीं है। उसने एक बार जिसे सत्य समझ लिया, फिर उसे उससे कोई डिगा नहीं सकता।” कुछ क्षण नीरव रहकर फिर बोली, “मेरा सारा मन मानो इस वक्त आनन्द में डूबा हुआ है। हर वक्त ऐसा लगता है कि इस जीवन का सब कुछ मिल गया है, अब मुझे कुछ नहीं चाहिए। यदि यह भगवान का निर्देश नहीं तो और क्या है, बताओ? प्रतिदिन पूजा कर देवता के चरणों में अपने लिए कुछ कामना नहीं करती, केवल यही प्रार्थना करती हूँ कि ऐसा आनन्द संसार में सबको मिले। इसलिए तो आनन्द देवर को बुला भेजा है कि उसके काम में अब से थोड़ी-बहुत सहायता करूँगी।”
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