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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
“जानती हूँ। स्वयं तुमसे भी ज्यादा जानती हूँ। यह तो मेरी पूजा है, मेरा ध्यान है। पूजा शेष करके किसके पैरों पर जल चढ़ाती हूँ? किसे पैरों पर फूल देती हूँ? तुम्हारे ही तो।”
नीचे से रसोइए की पुकार आयी, “माँ, रतन नहीं है, चाय का पानी तैयार हो गया।”
“आती हूँ।” यह आँखें पोंछकर वह उसी वक्त चली गयी।
कुछ देर बाद चाय की प्याली ले आयी और उसे मेरे सामने रखकर बोली, “तुम्हें किताबें पढ़ना अच्छा लगता है, तो अब से वही क्यों नहीं करते?”
“उससे रुपये तो आयेंगे नहीं?”
रुपयों का क्या होगा? रुपया तो हम लोगों के पास बहुत हैं?”
कुछ रुककर कहा, “ऊपर वाला यह दक्षिण का कमरा तुम्हारे पढ़ने का कमरा होगा। आनन्द देवर किताबें खरीदकर लायेंगे और मैं अपने मन के मुताबिक सजाकर रक्खूँगी। उसके एक बगल में मेरा सोने का कमरा रहेगा, और दूसरी ओर ठाकुरजी का कमरा। बस, इस जन्म में मेरा यही त्रिभुवन है- इसके बाहर मेरी दृष्टि कभी जाये ही नहीं।”
पूछा, “और तुम्हारा रसोईघर ? आनन्द संन्यासी आदमी है, उधर नजर न रक्खोगी तो उसे एक दिन भी नहीं रक्खा जा सकेगा। पर उसका पता कैसे मिला? वह कब आयेगा?”
राजलक्ष्मी ने कहा, “कुशारीजी ने पता दिया है, कहा है कि आनन्द बहुत जल्दी आयेंगे। इसके बाद सब मिलकर गंगामाटी जायेंगे और वहीं कुछ दिन रहेंगे।”
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