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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
“उनके फूल तोड़ दिया करूँगा और देवता का प्रसाद पाकर जितने दिन जिन्दा हूँ पड़ा रहूँगा। इसके बाद वे उसी बकुल के तले मेरी समाधि बना देंगे। पद्मा किसी दिन शाम को दीपक जला जायेगी- जिस दिन वह भूल जायेगी उस दिन दीप न जलेगा। सुबह के फूल तोड़कर उसके पास से कमललता जब निकलेगी तो कभी एक मुट्ठी मल्लिका के फूल बिखेर देगी और कभी कुन्द के फूल। यदि कभी कोई परिचित रास्ता भूलकर आ जायेगा तो उसे समाधि दिखाकर कहेगी, यहाँ हमारे नये गुसाईं रहते हैं- यहीं जो जरा ऊँची जगह है, जहाँ मल्लिका के सूखे और कुन्द के ताजे फूलों के साथ मिलकर झरे हुए बकुल के फूल छाये हुए हैं- यहीं।”
राजलक्ष्मी की आँखों में आँसू भर आये, पूछा, “और वह परिचित व्यक्ति तब क्या करेगा।”
मैंने कहा, “यह मैं नहीं जानता। हो सकता है कि बहुत-सा रुपया खर्च कर मन्दिर बनवा जाए...”
राजलक्ष्मी ने कहा, “नहीं, ऐसा न होगा। वह उस बकुल के तले को छोड़कर कहीं न जायेगा। पेड़ की हर डाल पर पक्षी कलरव करेंगे, गाना गायेंगे, लड़ेंगे-सैकड़ों सूखे पत्तो, सूखी हुई डालें गिरायेंगे- उन सबको साफ करने का भार उस पर रहेगा। सुबह चुनकर और साफ कर फूलों की माला गूँथेगा, रात को सबके सो जाने पर उन्हें वैष्णव कवियों के गीत सुनायेगा, फिर वक्त आने पर कमललता दीदी को बुलाकर कहेगा, हमें एकत्र करके समाधि देना, कहीं अन्तर रहने पाये, अलग-अलग न पहचाने जायें। और यह लो रुपये, इनसे मन्दिर बनवा देना, राधाकृष्ण की मूर्ति प्रतिष्ठित करना, पर कोई नाम मत लिखना, कोई चिह्न मत रखना- किसी को मालूम न होने पाए कि कौन हैं और कहाँ से आये।”
कहा, “लक्ष्मी, तुम्हारी तसवीर तो हो गयी और भी मधुर और भी सुन्दर!”
राजलक्ष्मी ने कहा, “क्योंकि यह तसवीर सिर्फ बातों से नहीं गढ़ी गयी है गुसाईं, यह सत्य है जो है। और यहीं पर दोनों में फर्क है। मैं कर सकूँगी, पर तुमसे नहीं होगा। तुम्हारे द्वारा अंकित बातों की तसवीर सिर्फ बातें होकर ही रह जाँयगी।”
“कैसे जाना?”
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