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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
कहा, “आराधना में त्रुटि थी। उसे सुधारने का वक्त है, अब भी तुम्हें कर्मठ आदमी मिल सकता है- काफी सुन्दर, स्वस्थ, लम्बा-चौड़ा जवान; जिसे न कोई हरा सकेगा और न ठग ही सकेगा; जिस पर काम का भार देकर निश्चिन्त, हाथ में रुपया-पैसा सौंपकर निर्भय हुआ जा सकेगा। जिसकी खबरदारी नहीं करनी होगी, भीड़ में जिसे खो देने की व्याकुलता नहीं, जिसे सजाकर तृप्ति, भोजन कराकर आनन्द- 'हाँ' के अलावा जो 'ना' बोलना ही नहीं जानता...”
राजलक्ष्मी चुपचाप मेरे मुँह की तरफ देख रही थी, अकस्मात् उसके सारे शरीर में काँटे उठ आये। मैंने कहा, “अरे यह क्या?”
“नहीं, कुछ नहीं।”
“काँप जो उठी।”
राजलक्ष्मी ने कहा, “मुँहज़बानी ही तुमने जो तसवीर खींची है, उसका अगर आधा भी सत्य हो तो शायद मैं मारे डर के ही मर जाऊँगी।”
“पर मेरे जैसे अकर्मण्य आदमी को लेकर तुम क्या करोगी?”
राजलक्ष्मी ने हँसी दबाकर कहा, “करूँगी और क्या। भगवान को कोसूँगी और हमेशा जलती-भुनती रहकर मरूँगी। इस जन्म में और तो कुछ आँखों से दिखाई नहीं देता।”
“बल्कि इससे अच्छा तो यही है कि तुम मुझे मुरारीपुर के अखाड़े में भेज दो।”
“उन्हीं का तुम कौन-सा उपकार करोगे?”
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