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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
राजलक्ष्मी ने हँसते हुए कहा, “क्या कहूँ, मेरे हाथ-पैर बँधे हुए हैं, नहीं तो ऐसे आड़े हाथों लेती कि जन्म-भर न भूलते। पर जाने दो, जब मैं उस युग की तरह तुम्हारी दासी होकर ही रहती हूँ, तब तुम्हारी सेवा ही मेरे लिए सबसे बड़ा काम है। पर तुम्हें मैं अपने बारे में जरा भी नहीं सोचने दूँगी। संसार में तुम्हारे लिए बहुत काम हैं, अब से वे ही करने होंगे। इस अभागिनी के पीछे तुम्हारा काफी वक्त तथा और भी बहुत कुछ नष्ट हो गया है, अब मैं और नष्ट नहीं करने दूँगी।”
कहा, “इसीलिए तो मैं जितनी जल्दी हो सके उसी पुरानी नौकरी पर जाकर हाजिर हो जाना चाहता हूँ।”
राजलक्ष्मी ने कहा, “नौकरी मैं तुम्हें नहीं करने दूँगी।”
“पर मनिहारी की दुकान भी मैं नहीं चला सकूँगा।”
“क्यों नहीं चला सकोगे?”
“पहला कारण तो यह है कि चीजों का दाम मुझे याद नहीं रहता, दूसरे दाम लेना और फौरन ही हिसाब करके बाकी पैसा लौटा देना तो और भी असम्भव है। दुकान तो उठ ही जायेगी, अगर खरीददारों के साथ लाठी न चल जाय तो गनीमत है।”
“तो एक कपड़े की दुकान करो।”
“इससे अच्छा है कि जंगली शेर-भालुओं की एक दुकान करा दो, मेरे लिए उसे चलाना ज्यादा आसान होगा।”
राजलक्ष्मी हँस पड़ी। बोली, मन लगाकर इतनी आराधना करने के बाद भी अन्त में भगवान ने मुझे एक ऐसा अकर्मण्य मनुष्य दिया जिसके द्वारा संसार का इतना-सा भी काम नहीं हो सकता!”
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