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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
“अगर हो तो खुश होओगी?”
राजलक्ष्मी ने सिर हिलाकर कहा, “नहीं होऊँगी। मैं तुम्हारी दासी हूँ, दासी को इससे ज्यादा मत समझना, मैं यही चाहती हूँ।”
उत्तर में कहा, “तुम उस युग की मनुष्य हो- वही हजार वर्ष पुराने संस्कार हैं!”
राजलक्ष्मी ने कहा, “मैं ऐसी ही हो सकूँ और हमेशा ऐसी ही हूँ।” यह कहकर क्षण-भर मेरी ओर देखा, फिर कहा, “तुम सोचते हो कि इस युग की औरतें मैंने नहीं देखी हैं? बहुत देखी हैं बल्कि तुम्हीं ने नहीं देखी हैं और देखी भी हैं तो बाहर-से। इनमें से किसी के साथ मुझे बदल लो, तो देखूँ कि तुम कैसे रह सकते हो? अभी मुझसे मजाक करते हुए कहा था कि दाँतों में तिनका दबाकर आई थी, तब तुम दस हाथ दूर से दाँतों में तिनका दबाए आओगे।”
“पर जब इसकी मीमांसा हो ही नहीं सकती, जब झगड़ा करने से क्या फायदा? सिर्फ यही कह सकता हूँ कि उनके बारे में तुमने अत्यन्त अविचार किया है।”
राजलक्ष्मी ने कहा, “अविचार अगर किया हो तो भी कह सकती हूँ कि अत्यन्त अविचार नहीं किया। ओ गुसाईं, मैं भी बहुत घूमी हूँ, बहुत देखा है। तुम लोग जहाँ अन्धे हो, वहाँ भी हमारी दस जोड़ी आँखें खुली हुई हैं।”
“पर जो कुछ देखा है रंगीन चश्मे से देखा है, इसीलिए सब गलत देखा है। दस जोड़ी भी व्यर्थ हैं।”
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