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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
“लिख लो बेटा, पर होशियारी से तैरना, कोई दुर्घटना न हो।”
“नहीं, कोई डर नहीं मौसी।”
राजलक्ष्मी ने आलमारी खोलकर उसके हाथ में रुपये दिये, लड़का द्रुतवेग से सीढ़ी पर से उतरते-उतरते हठात् खड़ा होकर बोला, “माँ ने कहा है कि छोटे मामा परसों सुबह आकर सारा 'एस्टीमट' बना देंगे।” और तेजी के साथ चला गया।
प्रश्न किया, “किस बात का एस्टीमेट?”
“मकान की मरम्मत नहीं करनी होगी? तीसरी मंजिल का जो कमरा उन्होंने आधा बनवाकर डाल रखा है, उसे पूरा नहीं करना होगा?”
“यह तो होगा, पर इतने आदमियों से तुमने पहिचान कैसे कर ली?”
“वाह, ये सब तो पास के मकान के ही आदमी हैं। पर अब नहीं, जाती हूँ- तुम्हारा खाना तैयार करने का वक्त हो गया।” यह कहकर वह उठी और नीचे चली गयी ।
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