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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
“बताओ, क्या वर माँगूँ?”
अन्न का ग्रास मुँह में डालकर सोचने लगा, पर कोई भी कामना न सूझी।
“तुम्हीं बताओ न लक्ष्मी, मेरे लिए तुम क्या माँगोगी?”
राजलक्ष्मी ने कहा, “आयु माँगूँगी, स्वास्थ्य माँगूँगी, और यह माँगूँगी कि तुम मेरे प्रति कठिन हो सको जिससे मुझे अधिक प्रश्रय देकर अब फिर मेरा सर्वनाश न करो। करने को ही तो बैठे थे!”
“लक्ष्मी, देखो यह तुम्हारे रूठने की बात है।”
“रूठना तो है ही। तुम्हारी वह चिट्ठी क्या कभी भूल सकूँगी?”
मुँह लटकाकर मैं चुप हो रहा।
उसने अपने हाथ से मेरा मुँह ऊपर उठाकर कहा, “पर इसलिए यह भी मैं नहीं सह सकती। किन्तु तुम कठोर तो हो नहीं सकोगे, तुम्हारा ऐसा स्वभाव ही नहीं है। लेकिन यह काम अब से मुझे ही करना पड़ेगा, अवहेला करने से काम नहीं चलेगा।”
पूछा, “कौन सा काम? और भी निर्जल उपवास?”
राजलक्ष्मी ने हँसकर कहा, “उपवास से सजा नहीं मिलती वरन् अहंकार बढ़ जाता है। अब मेरा पथ वह नहीं है।”
“तब तुमने कौन सा पथ ठहराया है?”
“ठीक नहीं कर सकी हूँ, खोज में घूम रही हूँ।”
“अच्छा, सचमुच तुम्हें यह विश्वास होता है कि मैं कभी कठोर हो सकता हूँ?”
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