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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
“होता है जी, और खूब होता है।”
“नहीं, कभी नहीं होता, तुम झूठ कहती हो।”
राजलक्ष्मी सिर हिलाकर हँसते हुए बोली, “अच्छा, झूठ ही सही। किन्तु गुसाईंजी, यही तो मेरे लिए विपद की बात हैं तुम्हारी कमललता ने भी क्या खूब नाम रक्खा है! दिनभर “हाँ जी,” “ओ जी,” “सुनो जी,” करते-करते जान जाती थी, अब से मैं पुकारूँगी “नये गुसाईं” कहकर।”
“मजे से।”
राजलक्ष्मी ने कहा, “तब तो शायद कभी गलती से मुझे कमललता ही समझ लोगे- पर इससे भी शान्ति ही मिलेगी। कहो, ठीक है न?”
हँसकर कहा, “लक्ष्मी, मरने पर भी स्वभाव नहीं बदलता। ये ही बादशाही जमाने की लौंडी की-सी बातें हैं, अब तक तो वे तुम्हें जल्लाद के हाथ सौंप देते!”
सुनकर राजलक्ष्मी भी हँस पड़ी। कहा, “जल्लाद के हाथों में खुद ही अपने आप को सौंप दिया है।”
“पर तुम सदा से इतनी दुष्ट रही हो कि तुम पर शासन करने की शक्ति किसी भी जल्लाद में नहीं है।”
राजलक्ष्मी प्रत्युत्तर में कुछ कहने जा ही रही थी कि एकाएक विद्युत वेग से उठ बैठी, “अरे, यह क्या! दूध कहाँ है? मेरे सिर की कसम, देखो, उठ न जाना।” और यह कहती हुई वह द्रुत गति से बाहर चली गयी।
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