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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
“अच्छा, यह तो बताओ कि इतना विनय क्यों?”
“विनय नहीं, यह सत्य है। अपनी औकात समझकर नहीं चली, और न तुम्हें मानकर ही चली, इसलिए अपराध के बाद अपराध करते-करते साहस बढ़ गया है। तुम्हारे ऊपर अब उस पहले वाली लक्ष्मी का अधिकार नहीं है- अपने ही दोष से उसे खो बैठी हूँ।”
देखा कि उसकी आँखों में आँसू आ गये हैं। कहा, “केवल आज-भर के लिए जाने की आज्ञा दे दो मेरे राजा, मैं माँ की आरती देख आऊँ।”
कहा, “ऐसा ही है तो कल चली जाना। तुम्हीं ने तो कहा, कि कल सारी रात जागकर मेरी सेवा करती रहीं। आज तुम बहुत थकी हुई हो।”
“नहीं, मुझे कतई थकावट नहीं है। केवल आज ही नहीं, कितनी ही बार बीमारी के मौकों पर देखा है कि लगातार रातों के बाद रात जागने पर भी तुम्हारी सेवा में मुझे कोई कष्ट प्रतीत नहीं हुआ। न मालूम मेरी समस्त थकावट को कौन मिटा देता है। कितने दिन से देवी-देवताओं को भूल गयी थी, किसी में भी मन न लगा सकी। मेरे राजा, आज मुझे न रोको, जाने की आज्ञा दे दो।”
“तो चलो, दोनों एक साथ चलें।”
राजलक्ष्मी की दोनों आँखें आनन्द से चमक उठीं। बोली, “तो चलो, पर मन ही मन देवता की अवज्ञा तो नहीं करोगे?”
जवाब दिया, “शपथ तो नहीं ले सकता, परन्तु तुम्हारा रास्ता देखते हुए मैं मन्दिर के द्वार पर ही खड़ा रहूँगा। मेरी तरफ से तुम देवता से वर माँग लेना।”
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