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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
“जरूर जानते हो। इस साड़ी को पहिचान सकते हो?”
“हाँ, पहचान सकता हूँ। मैंने बर्मा से खरीदकर भेजी थी।”
राजलक्ष्मी ने कहा, “उसी दिन मैंने विचार कर लिया था कि अपने जीवन के सबसे महान दिन पर इसे पहनूँगी- और कभी नहीं।”
“इसलिए आज पहनी है?”
“हाँ, इसीलिए आज पहनी है।”
हँसकर कहा, “किन्तु वह तो हो गया। अब उतार दो।” वह चुप हो रही। कहा, “सुना है कि तुम अभी-अभी कालीघाट जाओगी?”
“राजलक्ष्मी ने आश्चर्य के साथ कहा, “अभी? यह कैसे हो सकता है? तुम्हें खिला-पिलाकर सुलाने के बाद ही तो छुट्टी मिलेगी।”
“नहीं, तब भी नहीं मिलेगी। रतन कह रहा था कि तुम्हारा खाना-पीना प्राय: बन्द-सा हो गया है। सिर्फ कल जरा-सा खाया था और आज से फिर उपवास शुरू हो गया है। मालूम है, मैंने क्या स्थिर किया है? अब से तुम्हें कड़े शासन में रखूँगा। अब तुम्हारी जो खुशी होगी, न कर सकोगी।”
राजलक्ष्मी ने प्रसन्न मुख से कहा- “ऐसा हो तो जी जाऊँ महाशयजी, तब खूब खाऊँगी-पीऊँगी, किसी झंझट में न पड़ना होगा।”
“इसीलिए आज तुम कालीघाट भी न जा सकोगी।”
राजलक्ष्मी ने हाथ जोड़कर कहा, “तुम्हारे पैरों पड़ती हूँ, सिर्फ आज-भर के लिए माफ कर दो, आयन्दा पुराने जमाने के नवाब-बादशाहों की खरीदी हुई लौंडी की तरह रहूँगी- इससे अधिक तुमसे और कुछ भी न चाहूँगी।”
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