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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
“यह तुमने कैसे समझा कि बढ़िया है।”
“वाह,- यह भी नहीं समझ सकता? विशुद्ध ताल, लय, सुर...”
राजलक्ष्मी ने बाधा देकर पूछा, “हाँ जी, ताल किसे कहते हैं?”
“ताल उसे कहते हैं जो बचपन में तुम्हारी पीठ पर पड़ती थी। याद नहीं है?”
राजलक्ष्मी ने कहा, “क्या कहा-याद नहीं? खूब याद है। कल खामख्वाह भीरु कहकर तुम्हारी निंदा कर डाली। कमललता ने सिर्फ तुम्हारे उदासीन मन का ही पता पाया है, शायद तुम्हारी वीरता की कहानी नहीं सुनी?”
“नहीं, क्योंकि आत्मप्रशंसा खुद नहीं करनी चाहिए। वह तुम सुना देना। पर उसका गला मीठा है, इसमें सन्देह नहीं।”
“मुझे भी सन्देह नहीं है।” कहने के साथ ही एकाएक प्रच्छन्न कौतुक से उसके आँखें चमक उठीं। बोली, “हाँ जी, तुम्हें वह गाना याद है? वही जिसे पाठशाला की छुट्टी होने पर तुम गाते थे और हम सब मुग्ध होकर सुनते थे- वही, “कहाँ गये प्राणों के प्राण हे दुर्योधन रे-ए-ए-ए-ए-”
हँसी दबाने के लिए उसने आँचल से मुँह को छिपा लिया, मैं भी हँस पड़ा। राजलक्ष्मी ने कहा, “पर गाना बहुत भावमय है। तुम्हारे मुँह से सुनकर मनुष्यों की तो कौन कहे, गाय-बछड़ों तक की आँखों में पानी आ जाता था।”
रतन के पैरों की आहट सुनाई दी। अविलम्ब ही दरवाजे के पास खड़े होकर उसने कहा-”चाय का पानी फिर चढ़ा दिया है माँ, तैयार होने में देर नहीं लगेगी।” यह कह कमरे के अन्दर दाखिल हो उसने चाय की कटोरी उठा ली।
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