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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
उठ बैठा। यद्यपि देर नहीं हुई थी तो भी सबेरा हो गया था, खिड़कियाँ खुली हुई थीं। प्रात:काल के उस स्निग्ध प्रकाश में राजलक्ष्मी की अद्भुत मूर्ति दिखाई दी। उसका स्नान और पूजा-पाठ समाप्त हो चुका है, गंगा-घाट के उड़िया पण्डे का लगाया हुआ सफेद और लाल चन्दन का टीका उसके मस्तक पर है, शरीर पर नयी लाल बनारसी साड़ी है, पूर्व की खिड़की से आई हुई थोड़ी-सी सुनहरी धूप तिरछी होकर उसके मुँह के एक तरफ पड़ रही है, उसके होठों के कोने में सलज्ज कौतुक की दबी हुई हँसी है, फिर भी कृत्रिम क्रोध से सिकुड़ी हुई भौंहों के नीचे चंचल आँखों की दृष्टि मानो उछलते हुए आवेग से जगमगा रही है- देखकर आज भी आश्चर्य की सीमा न रही। एकाएक उसने कुछ हँसकर कहा, “अच्छा बताओ तो कि कल से इतने गौर से क्या देख रहे हो?”
“तुम्हीं बताओ न कि क्या देख रहा हूँ?”
राजलक्ष्मी ने फिर कुछ हँसकर कहा, “शायद यह देख रहे हो कि पूँटू मुझसे अधिक सुन्दर है या नहीं, या कमललता देखने में ज्यादा अच्छी लगती है कि नहीं- क्यों है न यही बात?”
“नहीं। यह बात आसानी से कही जा सकती है कि रूप के लिहाज से तो कोई तुम्हारे पास तक नहीं फटक सकता। इसके लिए इतने गौर से देखने की आवश्यकता नहीं।”
राजलक्ष्मी ने कहा, “अच्छा, रूप की बात जाने दो। पर गुण में?”
“गुण में? हाँ, यह मानना ही होगा कि इस विषय में मतभेद की सम्भावना है।”
“गुणों के बारे में तो सुना है कि वह कीर्तन कर सकती है।”
“हाँ, बहुत बढ़िया।”
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