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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
राजलक्ष्मी ने मुझसे कहा, “अब देरी मत करो, उठो। इस बार फिर चाय फेंके जाने पर रतन चिढ़ जायेगा। वह अपव्यय सहन नहीं कर सकता, क्यों ठीक है न रतन?”
रतन भी जवाब देना जानता है। बोला, “माँ, आपका बर्दाश्त नहीं कर सकता। पर बाबू के लिए मैं सब कुछ सहन कर सकता हूँ।” कहकर वह चाय की कटोरी लेकर चला गया। क्रोध में वह राजलक्ष्मी को 'आप' कहता था, अन्यथा 'तुम' कहकर ही पुकारता था।
राजलक्ष्मी ने कहा- “रतन सचमुच तुमको बहुत प्यार करता है।”
“मेरा भी यही खयाल है।”
“हाँ। जब तुम काशी से चले आये तो उसने झगड़ा करके मेरा काम छोड़ दिया। मैंने नाराज होकर कहा, “रतन मैंने तेरे साथ जो सलूक किया, उसका क्या यही प्रतिफल है?” उसने कहा, “माँ, रतन नमकहराम नहीं है। मैं भी बर्मा जा रहा हूँ, बाबू की सेवा करके तुम्हारा ऋण चुका दूँगा।” तब उसका हाथ पकड़ लिया और अपना अपराध स्वीकार कर उसे शान्त किया।”
कुछ ठहरकर कहा, “इसके बाद तुम्हारे विवाह का निमन्त्रण-पत्र आया।”
बाधा देकर कहा, “झूठ न बोलो। तुम्हारी राय जानने के लिए...”
इस बार उसने भी बाधा देकर कहा, “हाँ जी हाँ, मालूम है। नाराज होकर यदि विवाह करने को लिख देती तो कर लेते न?”
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