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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
उसकी दोनों आँखों से टप-टप आँसू गिरने लगे, मेरे उन्हें हाथ से पोंछ देने पर बोली, “अपने ही हाथ से विष का पौधा लगाया था, अब उसमें फल लग गये हैं। खा नहीं सकती, सो नहीं सकती, आँखों की नींद हराम हो गयी, न जाने कैसे-कैसे असम्बद्ध डर होने लगे जिनका न सिर न पैर। गुरुदेव तब मकान में थे, उन्होंने कोई कवच जैसा हाथ में बाँध दिया, कहा, बेटी, सुबह एक ही आसन पर बैठकर तुमको दस हजार बार इष्ट नाम का जप करना होगा। पर कहाँ कर सकी? मन में तो आग जल रही थी, पूजा पर बैठते ही दोनों आँखों से आँसुओं की धार बह चलती- उसी समय आई तुम्हारी चिट्ठी और तब इतने दिनों बाद रोग पकड़ा गया।”
“किसी ने पकड़ा- गुरुदेव ने? इस बार शायद उन्होंने फिर एक कवच लिख दिया?”
“हाँ जी, लिख दिया है और उसे तुम्हारे गले में बाँधने के लिए कहा है!”
ऐसा ही करना, बाँध देना, अगर तुम्हारा रोग अच्छा हो जाय।”
राजलक्ष्मी ने कहा, “उस चिट्ठी को लेकर मेरे दो दिन कटे। कैसे कटे यह नहीं जानती। रतन को बुलाकर उसके हाथों चिट्ठी का जवाब भेज दिया। गंगास्नान कर अन्नपूर्णा के मन्दिर में खड़े होकर कहा, “माँ, ऐसा करो कि समय रहते उनके हाथों चिट्ठी पहुँच जाय, मुझे आत्महत्या न करनी पड़े'।” मेरे मुँह की ओर देखकर कहा, “मुझे इस तरह क्यों बाँधा था बोलो?”
सहसा इस जिज्ञासा का उत्तर न दे सका। इसके बाद कहा, “तुम औरतों के द्वारा ही यह सम्भव है। हम यह सोच भी नहीं सकते, समझ भी नहीं सकते।”
“स्वीकार करते हो?”
“हाँ।”
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