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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
पूछा, “बंकू आजकल क्या कहता है?”
राजलक्ष्मी ने जरा म्लान हँसी हँसकर कहा, “बहुओं के आने पर सब लड़के जो कहते हैं, वही।”
“उससे ज्यादा कुछ नहीं?”
“कुछ नहीं तो नहीं कहती, पर वह मुझे दु:ख क्या देगा? दु:ख तो सिर्फ तुम्हीं दे सकते हो। तुम लोगों के अलावा औरतों को सचमुच का दु:ख और कोई भी नहीं दे सकता।”
“पर मैंने क्या कभी कोई दु:ख दिया है लक्ष्मी?”
राजलक्ष्मी ने अनावश्यक ही मेरे कपाल में हाथ लगाया और उसे पोंछकर कहा, “कभी नहीं। बल्कि, मैंने ही आज तक तुमको न जाने कितने दु:ख दिए हैं। अपने सुख के लिए लोगों की नजरों में तुम्हें हेय बनाया, प्रवृत्तिवश तुम्हारा असम्मान होने दिया- उसका ही दण्ड है कि अब दोनों किनारे डूबे जा रहे हैं! देख तो रहे हो न?”
हँसकर कहा, “कहाँ, नहीं तो?”
राजलक्ष्मी ने कहा, “तो किसी ने मन्तर पढ़कर तुम्हारी दोनों आँखों पर पर्दा डाल दिया है।” फिर कुछ चुप रहकर कहा, “इतने पाप करके भी संसार में मेरे जैसा भाग्य किसी का कभी देखा है? पर मेरी आशा उससे भी नहीं मिटी। न जाने कहाँ से आ जुटा धर्म का पागलपन और हाथ आई लक्ष्मी अपने पैरों से ठुकरा दी। गंगामाटी से आकर भी चैतन्य नहीं हुआ, काशी से तुम्हें अनादर के साथ बिदा कर दिया।”
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