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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
राजलक्ष्मी ने एकाएक नि:श्वास छोड़कर कहा, “सो करने दो। जिस साधना से तुमको पाया जाता है उससे तो भगवान भी मिल सकते हैं। यह वैष्णव बैरागियों का काम नहीं है। मैं डरने जाऊँगी न जाने कहाँ की इस कमललता से? छी:!” कहकर वह उठी और बाहर चली गयी।
मेरे मुँह से भी एक दीर्घ नि:श्वास निकल गयी। शायद कुछ बेमन हो गया था, इस आवाज से होश में आया। मोटे तकिये को खींच चित लेटकर हुक्का पीने लगा।
ऊपर एक छोटा-सा मकड़ा घूम-घूम कर जाल बुन रहा था। गैस के उज्ज्वल प्रकाश में उसकी छाया बहुत बड़े बीभत्स जन्तु की तरह मकान की कड़ियों पर पड़ रही थी। आलोक के व्यवघान से छाया भी कई गुनी काया को अतिक्रम कर जाती है।
राजलक्ष्मी लौटकर मेरे ही तकिये के एक कोने में कोहनियों के बल झुककर बैठ गयी। हाथ लगाकर देखा कि उसके कपाल के बाल भीगे हुए हैं। शायद अभी-अभी आँख-मुँह धोकर आई है।
प्रश्न किया, “लक्ष्मी, एकाएक इस तरह कलकत्ते क्यों चली आयी?”
राजलक्ष्मी ने कहा, “एकाएक कतई नहीं। उस दिन के बाद रात-दिन चौबीस घण्टे मन न जाने कैसा होने लगा कि किसी भी तरह रहा न गया, डर लगा कि कहीं हार्ट-फेल न हो जाय- इस जन्म में फिर कभी आँखों से नहीं देख सकूँ” कहकर उसने हुक्के की नली मेरे मुँह से निकालकर दूर फेंक दी। कहा, “जरा ठहरो। धुएँ के मारे मुँह तक दिखाई नहीं देता, ऐसा अन्धकार कर रक्खा है।”
हुक्के की नली तो गयी पर बदले में मेरी मुट्ठी में उसका हाथ आ गया।
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