लोगों की राय

ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त

श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719
आईएसबीएन :9781613014479

Like this Hindi book 7 पाठकों को प्रिय

337 पाठक हैं

शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


“कहा कि इस तरह के उदासी, वैरागी-मन के मनुष्य की अपेक्षा अधिक दम्भी व्यक्ति दुनिया में खोजने पर भी नहीं मिलेगा। अर्थात् मैं दुर्धर्ष वीर हूँ, भीरु कतई नहीं।”

राजलक्ष्मी का चेहरा गम्भीर हो गया। परिहास की ओर उसने ध्यान ही न दिया। बोली, “तुम्हारे उदासीन मन की खबर उस हरामजादी ने कैसे पा ली?”

“वैष्णवियों के प्रति ऐसी अशिष्ट भाषा बहुत आपत्तिजनक है।”

राजलक्ष्मी ने कहा, “यह जानती हूँ। पर उसने तुम्हारा नाम तो रक्खा नये गुसाईं', और उसका अपना नाम क्या है?”

“कमललता। कोई-कोई प्रेम से कमलीलता भी कहता है। लोग कहते हैं कि वह जादू जानती है, उसका कीर्तन सुनकर मनुष्य पागल हो जाता है और वह जो चाहती है वही दे देता।”

“तुमने सुना है?”

“सुना है। चमत्कार!”

“उसकी उम्र क्या है?”

“जान पड़ता है तुम्हारे ही बराबर होगी। कुछ ज्यादा भी हो सकती है।”

“देखने में कैसी है?”

“अच्छी। कम-से-कम खराब तो नहीं कही जा सकती। जिन चपटी नाकों और गोदनावालियों को तुमने देखा है, उनके दल की वह नहीं है। वह भले घर की लड़की है।”

राजलक्ष्मी ने कहा, “मैं उसकी बात सुनकर ही समझ गयी। जब तक तुम रहे, तब तक तुम्हारी सेवा करती थी न?”

“हाँ। मेरी कोई शिकायत नहीं है।”

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book