|
ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
|
337 पाठक हैं |
|||||||
शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
राजलक्ष्मी ने फिर एक बार क्षण-भर के लिए मेरी ओर देखकर कहा, “वाकई विश्वास करते हो कि यह हम लोगों के लिए ही सम्भव है, पुरुष यथार्थ में ऐसा नहीं कर सकते?”
कुछ देर तक दोनों स्तब्ध रहे। राजलक्ष्मी ने कहा, “मन्दिर से बाहर निकल कर देखा कि हमारा पटने का लछमन साहू खड़ा है। मेरे हाथ वह बनारसी कपड़े बेचा करता था। बूढ़ा मुझे बहुत चाहता था और मुझे बेटी कहकर पुकारता था। आश्चर्यान्वित हो बोला, “बेटी, आप यहाँ?” मुझे मालूम था कि कलकत्ते में उसकी दुकान है। कहा, “साहूजी, मैं कलकत्ते जाऊँगी, मेरे लिए एक मकान ठीक कर सकते हो?”
उसने कहा, “ कर सकता हूँ। बंगाली मुहल्ले में मेरा अपना एक मकान है, सस्ते में खरीदा था। चाहो तो उतने ही रुपयों में वह मकान दे सकता हूँ।” साहू धर्म-भीरु व्यक्ति है, उस पर मेरा विश्वास था, राजी हो गयी। घर पर बुलाकर रुपये दे दिए और उसने रसीद लिखकर दे दी। उसी के आदमियों ने यह सब चीजें खरीद दी हैं। छह-सात दिन बाद ही रतन को साथ लेकर यहाँ चली आयी। मन ही मन कहा, “माँ अन्नपूर्णा, तुमने मुझ पर दया की है, नहीं तो यह सुयोग कभी न मिलता। मुझे उनके दर्शन होंगे ही, और आखिर दर्शन हो गये।”
कहा, “पर मुझे तो जल्दी ही बर्मा जाना होगा लक्ष्मी।”
राजलक्ष्मी ने कहा, “ठीक है, तो चलो न। वहाँ अभया है, सारे देश में बुद्ध देव के बड़े-बड़े मन्दिर हैं-उन सबको देख आऊँगी।”
कहा, “पर वह बड़ा गन्दा देश है लक्ष्मी, शुचि-वायुग्रस्त लोगों के आचार-विचार वहाँ नहीं चलते। उस देश में तुम कैसे जाओगी?”
|
|||||











