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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
सोच रहा था कि विदेश जाकर क्या करूँगा? क्या होगा इस नौकरी से? कोई नहीं बात तो है नहीं- उस दिन भी ऐसा क्या पाया था जिसको फिर से पाने के लिए आज लोभ करना होगा? सिर्फ कमललता ने ही तो नहीं कहा, द्वारका गुसाईं ने भी आश्रम में रहने के लिए एकान्त समादर से आह्वान किया है। यह क्या सब वंचना है, मनुष्य को धोखा देने के अलावा क्या इस आमन्त्रण में कुछ भी सत्य नहीं है? अब तक जीवन जिस तरह कटा है, क्या यही उसका शेष है? क्या अब कुछ भी जाने को बाकी नहीं रहा, क्या मेरे लिए सब जानना समाप्त हो गया? हमेशा इसकी अश्रद्धा और उपेक्षा ही की है, कहा है, सब असार है, सब भूल है, पर सिर्फ अविश्वास और उपहास को ही मूल-धन मान लेने से ही संसार में कभी कोई बड़ी वस्तु किसी को मिली है?
गाड़ी आकर हावड़ा स्टेशन पर रुक गयी। स्थिर किया कि रात को घर रहकर जो कुछ चीजें हैं, जो कुछ लेना-देना है, वह सब चुका पटा कर कल फिर आश्रम को लौट जाऊँगा। गयी मेरी नौकरी, और रह गया मेरा बर्मा जाना। जब घर पहुँचा तब रात के दस बजे थे। आहार का प्रयोजन तो था, पर उपाय न था। हाथ-मुँह धोकर और कपड़े बदलकर बिछौना झाड़ रहा था कि पीछे से एक सुपरिचित कण्ठ की आवाज आयी, “बाबूजी, आ गये?”
सविस्मय घूमकर देखा, रतन, “कब आया रे?”
“शाम को ही आया हूँ। बरामदे में बड़ी अच्छी हवा थी, आलस्य में जरा सो गया था।”
“बहुत अच्छा किया। खाया नहीं है न?”
“जी नहीं।”
“तब तो रतन, तूने बड़ी मुश्किल में डाल दिया।”
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