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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
इस दफा उसे पहिचाना। यह जोर ही उसका हमेशा का सच्चा परिचय है। जीवन में यह उससे फिर कभी न छूटा- इससे उसके निकट कभी किसी को अव्याहति नहीं मिली।
रास्ते के एक किनारे मरने को पड़ा था कि नींद टूटने पर आँखें खोलकर देखता हूँ कि वह सिरहाने बैठी है। तब सारी चिन्ताएँ उसे सौंपकर आँखें बन्द कर सो गया। यह भार उसका है, मेरा नहीं!
गाँव के मकान में आकर बीमार पड़ गया। यहाँ वह नहीं आ सकती थी-यहाँ वह मृत है-इससे बढ़कर और कोई लज्जा उसके लिए नहीं थी, फिर भी जिसे अपने निकट पाया वह वही राजलक्ष्मी थी।
चिट्ठी में लिखा है, “तुम्हारी देख-भाल कौन करेगा? पूँटू? और मैं सिर्फ नौकर की जुबानी खबर सुनकर लौट जाऊँगी? इसके बाद भी जीवित रहने के लिए कहते हो?”
इस प्रश्न का जवाब नहीं दिया। इसलिए नहीं कि जानता नहीं, बल्कि इसलिए कि साहस नहीं हुआ।
मन ही मन कहा, क्या केवल रूप में ही? संयम में, शासन में, सुकठोर आत्मनियन्त्रण में उस प्रखर बुद्धिमती के निकट यह स्निग्धा सुकोमल आश्रमवासिनी कमललता कितनी-सी है! पर उस इतनी-सी में ही इस बार मानो मैंने अपने स्वभाव की प्रतिच्छवि देखी। ऐसा लगा कि उसके निकट ही है मेरी मुक्ति, मर्यादा और नि:श्वास छोड़ने का अवकाश। वह कभी मेरी सारी चिन्ताएँ, सारी भलाई-बुराइयाँ अपने हाथों में लेकर राजलक्ष्मी की तरह मुझे आच्छन्न नहीं कर डालेगी।
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