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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
और वह वैष्णवी कमललता! उसका जीवन मानों प्राचीन वैष्णव कवि चित्तों के आँसुओं का गीत है। छन्दों में मेल नहीं, व्याकरण में भूलें हैं, भाषा में भी अनेक त्रुटियाँ हैं, पर उसका विचार तो उस ओर से नहीं किया जा सकता। मानो उसी का दिया हुआ कीर्तन का सुर है- जिसके मर्म में पैठता है, उसे ही उसका पता चलता है। वह मानो गोधूलि के आकाश की रंगबिरंगी तसवीर है। उसका नाम नहीं, संज्ञा नहीं-कलाशास्त्र के सूत्रों के अनुसार उसका परिचय देना भी विडम्बना है।
मुझसे कहा था, “चलो न गुसाईं, यहाँ से चल दें, गीत गाते गाते पथ ही पथ पर दोनों के दिन कट जायेंगे।”
उसे कहने में तो कुछ नहीं लगा, पर वह मुझे खटका। मेरा नाम रक्खा है उसने 'नये गुसाईं।” कहा, “असल नाम तो मैं मुँह से निकाल नहीं सकती गुसाईं।” उसका विश्वास है कि मैं उसके विगत-जीवन का बन्धु हूँ। मुझसे उसे डर नहीं, मेरे पास रहते हुए उसकी साधना में विघ्न नहीं आ सकता। वैरागी द्वारिकादास की वह शिष्या है, मालूम नहीं उन्होंने उसे किस साधना से सिद्धि-लाभ करने का मन्त्र दिया है।
एकाएक राजलक्ष्मी की याद आ गयी और उसकी उस कठोर चिट्ठी का खयाल आ गया जो स्नेह और स्वार्थ के मिश्रण से भरी हुई थी। तो भी जानता हूँ कि इस जीवन के पूर्व विराम पर वह मेरे लिए शेष हो गयी है। शायद यह अच्छा ही हुआ है। किन्तु उस शून्यता को भरने के लिए क्या कहीं भी कोई है? खिड़की के बाहर अन्धकार को ताकता हुआ चुपचाप बैठा रहा। एक-एक करके न जाने कितनी बातें और कितनी घटनाएँ याद आ गयीं। शिकार के आयोजन के लिए खड़ा किया हुआ कुमार साहब का वह तम्बू, वह दल-बल और अनेक वर्षों के बाद प्रवास में उस प्रथम साक्षात् के दिन की दीप्त काली आँखों में उसकी वह विस्मय-विमुग्ध दृष्टि! जिसे जानता था कि मर गयी है, जिसे पहिचान नहीं सका- उस दिन श्मशान के पथ पर उसी ने कितनी व्यग्र-व्याकुल विनती की थी और अन्त में क्रुद्ध निराशा का वह कैसा तीव्र अभिमान था! रास्ता रोककर कहा था, “जाना चाहते हो इसीलिए क्या मैं तुम्हें जाने दूँगी? देखूँ, कैसे जाते हो! इस विदेश में यदि कोई विपत्ति आ पड़ी, तो कौन देख-भाल करेगा? वे या मैं?”
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