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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
स्टेशन पहुँच गया। भाग्य अच्छा था, उसी वक्त गाड़ी मिल गयी, कलकत्ते के निवास-स्थान पर पहुँचने तक ज्यादा रात न होगी। टिकट खरीद कर बैठ गया और उसने सीटी देकर यात्रा शुरू कर दी। स्टेशन के प्रति उसे मोह नहीं, सजल आँखों से बार-बार घूमकर देखने की उसे जरूरत नहीं।
फिर वही याद आयी- मनुष्य के जीवन में दस दिन कितने-से हैं; फिर भी कितने बड़े हैं!
कल सुबह कमललता अकेली ही फूल तोड़ने जावेगी और उसके बाद उसकी सारे दिन चलने वाली देव-सेवा शुरू हो जायेगी! क्या मालूम, दस दिन के साथी नये गुसाईं को भूलने में उसे कितने दिन लगे।
उस दिन उसने कहा था, “सुख से ही तो हूँ गुसाईं। जिनके पाद-पद्मों पर अपने-आपको निवेदन कर दिया है वे दासी का कभी परित्याग नहीं करेंगे।” सो, यही हो। ऐसी ही हो।
बचपन से ही मेरे जीवन का कोई लक्ष्य नहीं है, बलपूर्वक किसी भी चीज की कामना करना मैं नहीं जानता- सुख-दु:ख सम्बन्धी मेरी धारणा भी अलग है। तथापि इतनी उम्र कट गयी सिर्फ दूसरों का अनुकरण करने में-दूसरों के विश्वास पर और दूसरों का हुक्म तामील करने में। इसलिए कोई भी काम मेरे द्वारा अच्छी तरह निर्वाहित नहीं होता। दुबिधा से दुर्बल मेरे सारे संकल्प और सारे उद्योग थोड़ी ही दूर चलते हैं और ठोकर खाकर रास्ते में ही चूर-चूर हो जाते हैं; तब सभी कहने लगते हैं, “आलसी है, किसी काम का नहीं।” शायद इसीलिए उन निकम्मे बैरागियों के अखाड़े में ही मेरा अन्तरवासी अपरिचित बन्धु अस्फुट छाया-रूप में मुझे दर्शन दे गया, मैंने बार-बार नाराज होकर मुँह फिरा लिया और उसने बार-बार स्मित हास्य से हाथ हिला-हिलाकर न जाने क्या इशारा किया।
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