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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719
आईएसबीएन :9781613014479

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


रतन ने पूछा, “और आपने?”

स्वीकार करना पड़ा, “मैंने भी नहीं खाया है।”

रतन ने खुश होकर कहा, “तब तो अच्छा ही हुआ। आपका प्रसाद पाकर रात काट दूँगा।”

मन ही मन कहा कि यह नाई-बेटा विनय का अवतार है, किसी भी तरह हतप्रभ नहीं होता। कहा, “तो किसी पास की दुकान में खोज यदि कुछ प्रसाद जुटा सके। पर शुभागमन किसलिए हुआ? फिर भी कोई चिट्ठी है?”

रतन ने कहा, “जी नहीं, चिट्ठी लिखने में बड़ी झंझट है। जो कुछ कहना होगा वे खुद मुँह से ही कहेंगी।”

“इसका मतलब? मुझे फिर जाना होगा क्या?”

“जी नहीं। माँ खुद आई हैं।”

सुनकर घबड़ा गया। उसे इस रात में कहाँ ठहराऊँ? क्या बन्दोबस्त करूँ? कुछ समझ में न आया। पर कुछ तो करना ही चाहिए, पूछा, “जब से आई हैं तब से क्या घोड़ागाड़ी में ही बैठी हैं?”

रतन ने हँसकर कहा, “नहीं बाबू, हमें आये चार दिन हो गये, इन चार दिनों से आपके लिए दिन-रात पहरा दे रहा हूँ। चलिए।”

“कहाँ? कितनी दूर?”

“कुछ दूर तो जरूर है, पर मैंने गाड़ी किराये कर रक्खी है, कष्ट नहीं होगा।”

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