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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
अतएव ठाकुर के कपड़ों में चुन्नट डालने बैठ गया। उस दिन जाना न हो सका। दूसरे दिन भी नहीं और उसके बाद वाले दिन भी नहीं। मैं बड़े सबेरे वैष्णवी के फूल तोड़ने का साथी बन गया। प्रभात में, मध्याह्न में, संध्या को-कुछ-कुछ काम वह मुझसे करा ही लेती है। इसी प्रकार स्वप्न की तरह दिन कटने लगे। सेवा में, सहृदयता में, आनन्द में, आराधना में, फूलों में, गन्ध में, कीर्तन में, पक्षियों के गान में- कहीं भी कोई छिद्र नहीं, फिर भी सन्दिग्ध मन बीच-बीच मं सजग हो भर्त्सना कर उठता है कि यह क्या खिलावाड़ कर रहे हो? बाहर के सारे सम्बन्ध तोड़कर इन थोड़े से निर्जीव खिलौनों के पीछे यह कैसा पागलपन कर रहे हो? इतनी बड़ी आत्मवंचना में मनुष्य जीवित कैसे रहता है? फिर भी यह अच्छा लगता है, जाऊँ-जाऊँ करके भी पैर नहीं बढ़ा पाता। इस तरफ मलेरिया कम है, फिर भी इस समय अनेक लोग ज्वरग्रस्त हो रहे हैं। गौहर सिर्फ एक दिन आया था, फिर नहीं आया। उसकी खोज-खबर लेने का समय भी नहीं निकाल पाता! यह मेरी दशा अच्छी हुई!
सहसा मन भय और धिक्कार से भर गया- यह मैं कर क्या रहा हूँ? संगति-दोष से क्या एक दिन यह सब सत्य मान बैठूँगा? स्थिर किया, अब नहीं, चाहे कुछ भी क्यों न हो, कल यह जगह छोड़कर मुझे भागना ही पड़ेगा।
हर रोज रात के अन्त में वैष्णवी आकर जगा देती है। प्रभाती के स्वर में वैष्णव कवियों का नींद उड़ा देने वाला वह गीत भक्ति और प्रेम का कितना सकरुण आवेदन होता है! हठात् उत्तर नहीं देता, कान लगाकर सुनता रहता हूँ। आँखों के कोनों में आँसू आ जाना चाहते हैं। मसहरी उठाकर जब वह खिड़की और दरवाजा खोल देती है तब नाराज होकर उठ बैठता हूँ, और मुँह धो कपड़े बदलकर साथ चल देता हूँ।
कई दिनों की आदत की वजह से आज अपने आप ही नींद खुल गयी। कमरे में अन्धकार है। एक बार ऐसा लगा कि रात अभी खत्म नहीं हुई है, परन्तु फिर सन्देह हुआ। बिछौना छोड़कर बाहर आया- देखता हूँ कि रात कहाँ है, सबेरा हो गया है। किसी के खबर देते ही कमललता आकर खड़ी हो गयी। उसका ऐसा अस्नात प्रस्तुत चेहरा इसके पहले नहीं देखा था।
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