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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
डर से पूछा, “तुम्हारी तबियत क्या अच्छी नहीं है?”
उसने म्लान हँसी हँसकर कहा, “गुसाईं, आज तुम जीत गये।”
“बताओ, कैसे?”
“तबियत आज वैसी अच्छी नहीं, वक्त पर नहीं उठ सकी।”
“तो आज फूल तोड़ने कौन गया?”
आँगन के एक ओर एक अधमरे तगर के पेड़ में कुछ थोड़े से फूल लगे थे, उन्हीं को दिखाकर बोली, “इस वक्त तो किसी तरह इन्हीं से काम चला जायेगा।”
“पर ठाकुर के गले की माला?”
“माला आज न पहना सकूँगी।”
सुनकर मन न जाने कैसा हो गया- उन्हीं निर्जीव खिलौनों के लिए! कहा, “नहाकर मैं तोड़ लाता हूँ।”
“तो जाओ, पर इतने सबेरे नहा नहीं सकोगे। बीमार पड़ जाओगे।”
“बड़े गुसाईंजी नहीं दिखाई देते?”
वैष्णवी ने कहा, “वे तो यहाँ हैं नहीं, परसों अपने गुरुदेव से मिलने नवद्वीप गये हैं।”
“कब लौटेंगे?”
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