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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
इस बार भी जवाब न दे सका, सिर्फ अपने आपसे पूछा, सच तो है, बार-बार यह बात क्यों पूछता हूँ? इससे मेरा लाभ?
मठ में लौटकर देखा कि इस बीच सभी लोग जाकर दैनिक कामों में लग गये हैं। उस वक्त झल्लरी की आवाज से व्यस्त होकर वृथा ही जल्दी मचाई थी। मालूम हुआ कि वह मंगल-आरती नहीं थी सिर्फ ठाकुरजी की निद्रा भंग करने का बाजा था। यह उन्हें ही सुहाता है।
हम दोनों को अनेकों ने देखा, पर किसी के भी देखने में कुतूहल नहीं था। कम-उम्र होने के कारण सिर्फ पद्मा एक बार मुस्कराई और फिर मुँह नीचा कर लिया। वह ठाकुरजी की माला गूँथती है। उसके पास डलिया रखकर कमललता ने सस्नेह कौतुक से तर्जन करके कहा, “हँसी क्यों जलमुँही?”
किन्तु उसने मुँह ऊपर नहीं उठाया। कमललता ने ठाकुरजी के कमरे में प्रवेश किया, और मैं भी अपने कमरे में दाखिल हुआ।
स्नान और आहार यथारीति और यथासमय सम्पन्न हुआ। शाम की गाड़ी से मेरे जाने की बात थी। वैष्णवी को खोजने गया तो देखा कि वह ठाकुरजी के कमरे में है और उन्हें सजा रही है। मुझे देखते ही बोली, “नये गुसाईं, यदि आए हो तो कुछ मेरी सहायता भी करो। पद्मा सिरदर्द लेकर पड़ी है और लक्ष्मी-सरस्वती दोनों बहिनों को एकाएक बुखार आ गया है, क्या होगा कुछ समझ में नहीं आता। वासन्ती रंग के इन दो कपड़ों में चुन्नट डाल दो न गुसाईं।”
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