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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
“यह मिथ्या छलना है गुसाईं।”
“छलना क्यों है?”
“क्यों, सो तुम भी जानते हो। पर यह बात तुमसे कही किसने कि मेरे न रहने पर ठाकुरजी की सेवा में सचमुच ही कमी हो सकती है? इस पर क्या तुम विश्वास करते हो?”
“करता हूँ। मुझे किसी ने कहा नहीं कमललता, मैंने खुद अपनी आँखों से देखा है।”
उसने और कुछ नहीं कहा, न जाने कैसे अन्यमनस्क भाव से क्षणकाल तक वह मेरे मुँह की ओर ताकती रही और उसके बाद फूल तोड़ने लगी।
डलिया भर जाने पर बोली, “बस, अब और नहीं।”
“गुलाब नहीं चुने?”
“नहीं, उन्हें हम नहीं तोड़तीं, यहीं से भगवान को निवेदन कर देती हैं। चलो, अब चलें।”
उजाला हो गया है। पर यह मठ ग्राम के एकान्त में है- इधर कोई ज्यादा आता-जाता नहीं, इसलिए तब भी वह पथ जन-हीन था और अब भी है। चलते-चलते एक बार फिर वही प्रश्न किया, “तुम क्या सचमुच यहाँ से चली जाओगी?”
“बार-बार यह बात पूछने से तुम्हें क्या लाभ होगा गुसाईं?”
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