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श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719
आईएसबीएन :9781613014479

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


मैं चुप बैठा रहा, कमललता कहने लगी, “पास में रुपया था- मकान का किराया चुकाकर मैं भी निकल पड़ी। संगी-साथी मिल गये, सब श्रीवृंदावनधाम जा रहे थे, मैं भी साथ हो ली।”

वैष्णवी ने कुछ रुककर कहा, “इसके बाद कितने तीर्थ, कितने पथ, और कितने पेड़ों के नीचे अनेक दिन कट गये...”

“यह जानता हूँ, पर सैकड़ों साधुओं की आँखों की दृष्टि का विवरण तो तुमने बताया ही नहीं, कमललता!”

वैष्णवी हँस पड़ी। बोली, “बाबाजी लोगों की दृष्टि अतिशय निर्मल है, उनके बारे में अश्रद्धा की बातें नहीं कहना चाहिए गुसाईं।”

“नहीं-नहीं, अश्रद्धा नहीं। अतिशय श्रद्धा के साथ ही उनकी कहानी सुनना चाहता हूँ कमललता।”

इस दफा वह नहीं हँसी, पर दबी हुई हँसी छिपा भी न सकी। बोली, “जो बाबाजी प्रेम करते हैं उनसे सब बातें खोलकर नहीं कही जातीं, हमारे वैष्णव-शास्त्र में मनाही है।”

“तो रहने दो। सब बातों का काम नहीं, पर एक बात बताओ। गुसाईं जी द्वारिका दास कहाँ मिले?”

कमललता ने संकोच से जीभ काटकर और कपाल पर हाथ देकर कहा, “मजाक नहीं करना चाहिए, वे मेरे गुरुदेव हैं गुसाईं।”

“गुरुदेव? तुमने उन्हीं से दीक्षा ली है?”

“नहीं, दीक्षा तो नहीं ली है, पर वे उतने ही पूजनीय हैं।”

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