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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
“पर इतनी सारी वैष्णवियाँ-सेवादासियाँ क्या...”
कमललता ने फिर जीभ काटकर कहा, “वे सब मेरी ही तरह उनकी शिष्या हैं। उनका भी उन्होंने ही उद्धार किया है।”
“निश्चय ही किया है पर 'परकीया साधना' या कुछ ऐसी ही जो एक साधना-पद्धति तुम लोगों की है- उसमें तो कोई दोष नहीं...”
वैष्णवी ने मुझे रोककर कहा, “तुम लोगों ने दूर रहकर सिर्फ हमारा हँसी-मजाक ही उड़ाया है, नज़दीक आकर कभी कुछ देखा तो है नहीं, इसीलिए आसानी से व्यंग्य कर सकते हो। हमारे बड़े गुसाईं जी संन्यासी हैं, उनका उपहास करने से पाप होता है नूतन गुसाईं- ऐसी बातें फिर कभी ज़बान पर मत लाना।” उसकी बातों से और गम्भीरता से कुछ हतप्रभ हो गया। वैष्णवी ने यह लक्ष्य कर जरा मुस्कुराते हुए कहा, “दो दिन हम लोगों के पास यहीं रहो न गुसाईं। केवल बड़े गुसाईं जी के लिए ही नहीं कह रही हूँ, मुझे तो तुम प्यार करते हो, और कभी यदि मुलाकात न हो तो कम-से-कम यह तो देख जाओ कि संसार में कमललता सचमुच में क्या लेकर संसार में रह रही है। यतीन को मैं आज भी नहीं भूली हूँ- दो दिन रहो, मैं कहती हूँ कि तुम यथार्थ में खुश होगे।”
चुप रहा। इन लोगों के बारे में एकदम ही कुछ न जानता होऊँ, सो बात नहीं है। असल वैष्णव की लड़की टगर की याद आ गयी। किन्तु मजाक करने की अब और प्रवृत्ति नहीं थी। यतीन के प्रायश्चित की घटना सारी अलोचना के बीच रह-रह कर जैसे मुझे भी उन्मना कर देती थी।
वैष्णवी ने अचानक प्रश्न किया, “क्यों गुसाईं, इस उम्र तक भी सचमुच तुमने कभी किसी को प्यार नहीं किया?”
“तुम्हारा क्या खयाल होता है कमललता?”
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