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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
इस विषय में बहस करने से कोई फायदा नहीं। युक्ति और भाषा- कोई भी प्रांजल नहीं है, तथापि यही खयाल किया कि दुष्कृति की शोकाच्छन्न स्मृति ने शायद इसी पथ पर चलकर पाप-पुण्य की उपलब्धि अर्जन की है और उससे सांत्वना पाईहै।
“कमललता, उसके बाद क्या हुआ?”
यह सुनकर वह सहसा मानो व्याकुल होकर कह उठी, “सच बताओ गुसाईं, इसके बाद भी मेरी बातें सुनने की इच्छा होती है?”
“सच ही कह रहा हूँ, होती है।”
वैष्णवी ने कहा, “मेरा भाग्य है जो इस जन्म में तुम्हारे दर्शन फिर हुए।” यह कह कुछ देर तक चुपचाप मेरी और देखते-देखते वह फिर कहने लगी, “कोई चार दिन बाद एक मरा हुआ लड़का पैदा हुआ। उसे गंगा के किनारे विसर्जित कर गंगा में नहाकर घर लौट आई। पिता जी ने रोकर कहा, “अब तो मैं नहीं रह सकता बेटी।”
“हाँ पिताजी, अब आप मत रहिए, आप घर लौट जाइए। बहुत दुख दिया, अब आप मेरी फिक्र न करें।”
पिताजी ने पूछा, “बीच में खबर दोगी न बेटी?”
“नहीं पिताजी ,मेरी खबर लेने की आप अब चेष्टा न कीजिएगा।”
“पर उषा, तुम्हारी माँ अब भी जीवित है!”
“मैं मरूँगी नहीं पिताजी, पर मेरी सती-लक्ष्मी माँ से कह देना कि उषा मर गयी। माँ को दु:ख तो होगा, पर लड़की जिन्दा है, जानकर और भी ज्यादा दु:ख होगा। आँखों के अश्रु पोंछकर पिताजी कलकत्ते चले गये।”
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