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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
एक मुहूर्त के लिए मौन रहकर वैष्णवी फिर कहने लगी, “उस दिन ठाकुर की अर्पित माला ठाकुरजी के पाद-पद्मों में ही लौटा आयी। मन्मथ की अपवित्रता दूर हो गयी, पर पापिनी उषा की अपवित्रता इस जीवन में दूर न हुई नये गुसाईं।”
मैंने कहा, “उसके बाद?”
वैष्णवी ने मुँह फेर लिया, कोई जवाब नहीं दिया। समझ गया कि अब उसे सँभलने में देर लगेगी। काफी देर तक हम दोनों ही चुप बैठे रहे।
उसका शेष अंश सुनने का आग्रह प्रबल हो उठा। पर सोच रहा था कि प्रश्न करना उचित है या नहीं। वैष्णवी ने आर्द्र मृदु कण्ठ से खुद ही कहा, “गुसाईं, जानते हो, संसार में पाप नाम की चीज इतनी भयंकर क्यों है?”
“अपने खयालों के मुताबिक एक तरह से जानता हूँ, पर तुम्हारी धारणा के साथ शायद वह न मिले।”
उसने प्रत्तयुत्तर में कहा, “नहीं जानती कि तुम्हारा क्या खयाल है। पर उस दिन से मैंने अकेले ही अपने खयाल के अनुसार समझ लिया है गुसाईं, कि गर्व के साथ तुम कितने ही लोगों को कहते हुए सुनोगे कि कुछ भी नहीं होता। वे अनेक आदमियों का उदाहरण देकर अपनी बात प्रमाणित करना चाहेंगे। पर इसकी तो कोई जरूरत नहीं। इसका प्रमाण है मन्मथ और प्रमाण हूँ मैं खुद। अब भी हम लोगों का कुछ नहीं हुआ। अगर कुछ होता तो मैं इसे इतना भयंकर न कहती, पर ऐसा तो नहीं है, इसका दण्ड भोगते हैं निरपराध और निर्दोष लोग। यतीन को आत्महत्या का बड़ा डर था, पर उसी से; वह अपनी दीदी के अपराध का प्रायश्चित कर गया। कहो गुसाईं, इससे और अधिक भयंकर तथा निष्ठुर संसार में क्या है? पर ऐसा ही होता है, इसी तरह भगवान शायद अपनी सृष्टि की रक्षा करते हैं।”
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