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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
यतीन चौंक उठा और बोला, “उषा दीदी ने खुद मेरा नाम लिया है? वह तो कभी झूठ नहीं बोलती-इतना बड़ा झूठा अपवाद तो उनके मुँह से कभी बाहर नहीं निकल सकता!”
“मन्मथ और एक बार चिल्ला उठा, 'अब भी इनकार करता है पाजी, अभागा, शैतान, अपने मालिक से तो पूछ, वे क्या कहते हैं!” '
मालिक ने अनुमोदन करते हुए कहा, “हाँ।”
यतीन ने पूछा, “खुद दीदी ने मेरा नाम लिया है?”
मालिक ने फिर सिर हिलाकर कहा, “हाँ।”
“पिताजी को वह देवता-तुल्य मानता था। इसके बाद उसने और कोई प्रतिवाद नहीं किया। स्तब्ध हो कुछ देर तक खड़े रहने के बाद धीरे-धीरे चला गया। क्या सोचा, यह वही जाने।
“रात को किसी ने उसकी तलाश नहीं की। सुबह ही किसी ने आकर खबर दी। सब दौड़ पड़े और देखा कि हमारे टूटे अस्तबल के एक कोने में गले में रस्सी बाँधे यतीन झूल रहा है!”
वैष्णवी ने कहा, “यह नहीं जानती कि भतीजे की आत्महत्या के लिए शास्त्रों में चाचा के लिए शौच की विधि है या नहीं गुसाईं। शायद न हो, या शायद डुबकी लगाने से ही शुद्धि हो जाती हो, सो कुछ भी हो, शुभ दिन सिर्फ कुछ दिनों के लिए और आगे टल गया। इसके बाद गंगा-स्नान से शुद्ध और पवित्र हो माला और तिल लगाए हुए मन्मथ गुसाईं पापिनी के पाप-विमोचन का शुभ संकल्प लिये हुए नवद्वीप में आकर हाजिर हो गये।”
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