लोगों की राय

ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त

श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719
आईएसबीएन :9781613014479

Like this Hindi book 7 पाठकों को प्रिय

337 पाठक हैं

शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


वैष्णवी ने कहना शुरू किया, “मेरे और भी दो छोटे भाई हैं, पर माँ-बाप की मैं इकलौती बेटी थी। हम श्रीहट्ट के रहने वाले हैं, पर चूँकि पिताजी व्यापारी आदमी थे, उनका व्यापार कलकत्ते में था, इसलिए बचपन से ही मैं कलकत्ते में पली हूँ। गृहस्थी के साथ माँ गाँव के मकान में ही रहती थीं। मैं पूजा के दिनों में अगर कभी गाँव जाती तो महीने-भर से ज्यादा न रह पाती। वहाँ रहना मुझे अच्छा भी न लगता। कलकत्ते में ही मेरी शादी हुई और सत्रह वर्ष की उम्र में कलकत्ते में ही मैंने उन्हें खो दिया। उनके नाम की वजह से ही गुसाईं, तुम्हारा नाम गौहर गुसाईं के मुँह से सुनकर मैं चौंक पड़ी। इसलिए 'नये गुसाईं' के नाम से पुकारती हूँ, वह नाम जुबान पर नहीं ला सकती।”

“यह मैं समझ गया, उसके बाद?”

वैष्णवी ने कहा, “आज जिसके साथ तुम्हारी मुलाकात हुई थी उसका नाम मन्मथ है, वह हमारा मुनीम था।” कह कर वह क्षण भर के लिए मौन रही, फिर बोली, “जब मेरी उम्र इक्कीस साल की थी तब मेरे संतान होने की सम्भावना हुई...”

वैष्णवी कहने लगी, “मन्मथ का एक पितृहीन भतीजा हमारे ही मकान में रहता था। पिताजी उसे कॉलेज में पढ़ाते थे। उम्र में मुझसे जरा छोटा था। वह मुझे इतना प्यार करता था जिसकी सीमा नहीं। उसे बुलाकर कहा, 'यतीन, तुमसे और कभी तो कुछ माँगा नहीं है भाई, इस विपत्ति में अन्तिम बार मुझे थोड़ी-सी मदद करो। मुझे एक रुपये का जहर खरीदकर ला दो।” पहले तो वह मेरी बात नहीं समझा, पर जब उसकी समझ में आया तो उसका चेहरा मुर्दे की तरह फीका पड़ गया। कहा, “देरी मत करो भाई, तुम्हें अभी खरीदकर ला देना होगा। इसके अलावा मेरे लिए और कोई दूसरा रास्ता नहीं है।”

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book