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ई-पुस्तकें >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
वैष्णवी ने कहा, “तुमसे तो पहले ही कहा है गुसाईं, प्रयोजन तुम्हारा नहीं, मेरा है, पर यह क्या तुम सच कह रहे हो, कल के बाद हमारी मुलाकात नहीं होगी? नहीं ऐसा कभी नहीं हो सकता। मेरा मन कहता है कि फिर मुलाकात होगी- मैं यही आशा लेकर रहूँगी। पर क्या वास्तव में मेरे बारे में कुछ भी जानने की इच्छा तुम्हारी नहीं है? हमेशा क्या सिर्फ एक अनुमान और सन्देह को ही लिये रहोगे?”
प्रश्न किया, “आज वन में जिस आदमी से मेरी मुलाकात हुई, जिसे तुम आश्रम में घुसने नहीं देतीं, जिसके उपद्रव से तुम भागना चाहती हो- वह क्या वास्तव में तुम्हारा कोई नहीं होता? बिल्कुल पराया है?”
“किस के डर से भाग रही हूँ, यह तुम समझ गये गुसाईं?”
“हाँ, ऐसा ही तो लगता है। पर वह है कौन?”
“वह कौन है? वह मेरे इह और परलोक की नरक-यन्त्रणा है। इसीलिए तो निरन्तर रोकर भगवान से कहती हूँ, प्रभु, मैं तुम्हारी दासी हूँ- मनुष्य के प्रति इतनी जबरदस्त घृणा मेरे मन से निकाल दो, जिससे मैं फिर आसानी से साँस लेकर जी सकूँ। नहीं तो मेरी सारी साधना व्यर्थ हो जायेगी।”
उसकी आँखों से जैसे आत्मग्लानि फूट पड़ी, मैं चुप हो रहा।
वैष्णवी ने कहा, “फिर भी, एक दिन उससे ज्यादा मेरा अपना कोई नहीं था- संसार में इतना प्यार किसी ने भी किसी को नहीं किया होगा।” उसका कथन सुनकर विस्मय की सीमा नहीं रही और इस सुरूपा रमणी की तुलना में उस प्रेम के पात्र की कुत्सित और भद्दी शक्ल को स्मरण कर मेरा मन बहुत ही संकुचित हो गया।
बुद्धिमती वैष्णवी ने मेरा मुँह देखकर यह ताड़ लिया। कहा, “ गुसाईं, यह तो उसका सिर्फ बाहर का परिचय है- उसके भीतर का परिचय सुनो।”
“कहो।”
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